हमारी पंचायत, देहरादून
ग्रामीण स्वास्थ्य और पोषण तंत्र की रीढ़ मानी जाने वाली आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता आज ऐसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, जहां उनसे उम्मीदें लगातार बढ़ाई जा रही हैं, लेकिन संसाधन और सहारा उसी अनुपात में घटता जा रहा है। यही वजह है कि कम मानदेय और ज्यादा लक्ष्य के दबाव में जमीनी स्वास्थ्य तंत्र धीरे-धीरे कमजोर होता दिख रहा है। यह स्थिति किसी एक कर्मचारी की नीयत या क्षमता पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि उस प्रणाली की पोल खोलती है, जिसमें योजनाएं कागजों में मजबूत और जमीन पर कमजोर नजर आती हैं।
उत्तराखंड सहित देश के अधिकांश राज्यों में आंगनबाड़ी केंद्रों को बच्चों के पोषण, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और गर्भवती व धात्री महिलाओं की देखभाल का केंद्र माना गया है। लेकिन व्यवहार में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से आज पोषण वितरण के साथ-साथ सर्वेक्षण, डिजिटल डेटा एंट्री, विभिन्न विभागीय अभियानों, चुनावी ड्यूटी और रिपोर्टिंग का काम भी लिया जा रहा है। उम्मीदें बढ़ीं, संसाधन घटे, इस विरोधाभास ने कार्यकर्ताओं को ऐसे बोझ के नीचे ला खड़ा किया है, जहां प्राथमिक जिम्मेदारियों पर पूरा ध्यान देना कठिन होता जा रहा है।
इसी दबाव का एक गंभीर परिणाम यह भी सामने आ रहा है कि कई क्षेत्रों में आंकड़ों के सहारे व्यवस्था को संभालने की कोशिश की जा रही है। जमीनी जांच में यह तथ्य सामने आया है कि कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों में स्कूल जाने वाले बच्चों के नाम भी पंजीकरण में दर्ज दिखाए जाते हैं, ताकि उपस्थिति और लाभार्थियों की संख्या कागजों में बेहतर दिखाई दे। लक्ष्य पूरे, सेवा अधूरी, यह स्थिति योजनाओं की वास्तविक तस्वीर को धुंधला कर देती है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह व्यक्तिगत स्तर पर की गई धोखाधड़ी नहीं, बल्कि लक्ष्य-आधारित निगरानी और निरीक्षण के दबाव से उपजी एक प्रणालीगत समस्या है।
सरकारी रिकॉर्ड में कई ब्लॉकों में आंगनबाड़ी उपस्थिति संतोषजनक दिखाई देती है, लेकिन फील्ड स्तर पर वास्तविक मौजूदगी इससे कम पाई जाती है। जब आंकड़े ही वास्तविक स्थिति नहीं दर्शाएंगे, तो नीतिगत सुधार कैसे संभव होंगे—यही सवाल विशेषज्ञ उठा रहे हैं। स्वास्थ्य योजनाएं कागज में मजबूत और जमीन पर कमजोर क्यों दिखती हैं, इसका उत्तर इसी असंतुलन में छिपा है।
आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका भी इसी तंत्र का अहम हिस्सा है। गर्भवती महिलाओं की पहचान, प्रसव पूर्व जांच, संस्थागत प्रसव के लिए प्रेरणा, टीकाकरण, नवजात शिशु देखभाल, परिवार नियोजन और स्वास्थ्य जागरूकता जैसे कार्यों के साथ-साथ अब गैर-संचारी रोगों की स्क्रीनिंग और डिजिटल रिपोर्टिंग भी इनके जिम्मे है। इसके बावजूद उनका पारिश्रमिक प्रोत्साहन आधारित है, जो कई बार समय पर नहीं मिल पाता। रीढ़ बनी कार्यकर्ता, कमजोर रही व्यवस्था। यह पंक्ति आशा कार्यकर्ताओं की स्थिति को सबसे सटीक रूप में बयान करती है।
ग्रामीण स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक ही कार्यकर्ता से कई विभागों का काम लिया जाएगा, तो सेवा की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है। आंकड़ों का दबाव और जमीनी हकीकत के बीच फंसी यह व्यवस्था न तो कार्यकर्ता को संतोष दे पा रही है और न ही लाभार्थियों को पूरी सेवा। इसका सीधा असर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण स्तर और स्वास्थ्य जागरूकता पर पड़ता है, जो लंबे समय में गंभीर परिणाम ला सकता है।
नीतिगत स्तर पर यह स्थिति एक बड़े सिस्टम फेल्योर की ओर इशारा करती है। आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं से अपेक्षित परिणाम हासिल करने के लिए उनके कार्य का युक्तिकरण, मानदेय में यथार्थवादी वृद्धि और लक्ष्य निर्धारण की प्रक्रिया में सुधार आवश्यक है। जब तक व्यवस्था यह नहीं समझेगी कि सीमित संसाधनों में असीमित अपेक्षाएं रखना व्यावहारिक नहीं है, तब तक यह तंत्र आंकड़ों के सहारे ही अपनी सफलता साबित करता रहेगा।
विशेषज्ञों का साफ मानना है कि समाधान दंडात्मक कार्रवाई या नई रिपोर्टिंग प्रणाली जोड़ने में नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं को वास्तविक सहारा देने में है। यदि बोझ घटे और सहारा बढ़े, तभी आंगनबाड़ी और आशा व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य – ग्रामीण स्वास्थ्य और पोषण को मजबूत करने को सही अर्थों में पूरा कर पाएगी।


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