सीमांत स्वास्थ्य: उम्मीद जगी, जवाबदेही बाकी

सीमांत स्वास्थ्य: उम्मीद जगी, जवाबदेही बाकी

हमारी पंचायत, देहरादून

उत्तराखंड के सीमांत और दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली कोई नई बात नहीं है। वर्षों से डॉक्टरों की कमी, पशु चिकित्सकों के खाली पद, दवाओं की अनुपलब्धता और लंबी दूरी तय करने की मजबूरी यहां के ग्रामीण जीवन की सच्चाई रही है।

ऐसे में हाल ही में तीन सीमांत जिलों के 108 गांवों में मानव और पशु चिकित्सा सेवाओं की जिम्मेदारी आईटीबीपी को सौंपने का फैसला एक सराहनीय पहल के रूप में सामने आया है। पशुपालन विभाग और स्वास्थ्य विभाग द्वारा आईटीबीपी के साथ किए गए समझौता ज्ञापन (MoU) से यह उम्मीद जगी है कि सीमांत क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बेहतर हो सकेगी।

हालांकि सवाल यह भी है कि यह पहल कहीं प्रशासनिक लापरवाही, समन्वय की कमी और निगरानी के अभाव की भेंट न चढ़ जाए। सीमांत स्वास्थ्य के क्षेत्र में यह अच्छी शुरुआत जरूर है, लेकिन इसकी कड़ी निगरानी उतनी ही जरूरी होगी।

आईटीबीपी पहले से ही सीमांत इलाकों में तैनात है और वहां बुनियादी ढांचे, मेडिकल स्टाफ और आपातकालीन संसाधनों की मौजूदगी अन्य विभागों की तुलना में बेहतर मानी जाती है। इस समझौते के तहत आईटीबीपी के मेडिकल स्टाफ द्वारा स्थानीय आबादी को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं देने के साथ-साथ पशुपालन से जुड़े ग्रामीणों को पशु चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध कराई जानी है। सीमांत क्षेत्रों में जहां पशुपालन आजीविका का प्रमुख साधन है, वहां पशु स्वास्थ्य सेवाओं का मजबूत होना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी राहत लेकर आ सकता है।

लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि यह व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं बल्कि एक वैकल्पिक सहारा है। वर्षों से खाली पड़े चिकित्सक और पशु चिकित्सक पद, उपकेंद्रों की बदहाल इमारतें और संसाधनों की कमी इस बात की गवाही देती हैं कि नागरिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने में सरकार अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा सकी। ऐसे में आईटीबीपी पर अतिरिक्त जिम्मेदारी डालना कहीं न कहीं प्रशासनिक असफलताओं की भरपाई जैसा भी प्रतीत होता है।

इस पहल की सबसे बड़ी चुनौती जवाबदेही और समन्वय की होगी। स्वास्थ्य विभाग, पशुपालन विभाग और आईटीबीपी—तीनों के बीच स्पष्ट भूमिका तय किए बिना योजना के प्रभावी क्रियान्वयन की उम्मीद अधूरी रह जाएगी। यदि दवाओं की आपूर्ति, रेफरल सिस्टम, आंकड़ों का संकलन और फॉलो-अप की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं हुई, तो यह योजना भी कागजों तक सीमित होकर रह सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सीमांत गांवों में पहले भी कई योजनाएं बड़े दावों के साथ शुरू हुईं, लेकिन समय के साथ वे लापरवाही और निरीक्षण की कमी के चलते कमजोर पड़ गईं। इसलिए इस बार सरकार को नियमित समीक्षा, क्षेत्रीय निरीक्षण और सार्वजनिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था करनी होगी। यह जरूरी है कि यह पहल केवल MoU तक सीमित न रहे, बल्कि धरातल पर उसका वास्तविक लाभ दिखाई दे।

ग्रामीणों के लिए भी यह जानना जरूरी होगा कि वे किस स्थिति में आईटीबीपी की सेवाएं लें और किन मामलों में सरकारी अस्पताल या पशु चिकित्सालय की जिम्मेदारी तय होगी। यदि यह स्पष्टता नहीं रही, तो भ्रम की स्थिति बनेगी और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टाली जाती रहेगी।

कुल मिलाकर, सीमांत गांवों में स्वास्थ्य और पशु चिकित्सा सेवाओं के लिए आईटीबीपी की भागीदारी उम्मीद जगाने वाली है। लेकिन यह उम्मीद तभी स्थायी बन सकेगी, जब सरकार समय-समय पर इस व्यवस्था का संज्ञान ले, कमियों को स्वीकार करे और सुधार के लिए ठोस कदम उठाए। अन्यथा यह पहल भी एक अच्छी मंशा लेकिन अधूरी तैयारी के रूप में याद की जाएगी। सीमांत स्वास्थ्य की यह शुरुआत सरकार के लिए एक अवसर है—या तो वह इसे जवाबदेही के साथ सफल बनाए, या फिर इसे भी प्रशासनिक उदासीनता की सूची में शामिल होने दे।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *