देवभूमि में क्यों खत्म हो रही है संवेदनशीलता?

देवभूमि में क्यों खत्म हो रही है संवेदनशीलता?

हमारी पंचायत, देहरादून

सबसे गंभीर और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित मामला है 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की हत्या। सितंबर 2022 में रिषिकेश के वनांत्रा रिसॉर्ट में काम कर रही अंकिता, जहाँ वह रिसेप्शनिस्ट थी, वहाँ उसके मालिक और दो अन्य कर्मचारियों ने उसे मार डाला, बाद में उसका शरीर चिल्ला नहर से बरामद हुआ। आरोप था कि वह उसे वीआईपी मेहमानों के लिए ‘अतिरिक्त सेवाएँ’ प्रदान करने को दबाव डाल रहे थे, जिसका उसने विरोध किया और परिणामस्वरूप उसकी हत्या कर दी गई। इस केस में मुख्य आरोपियों को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, लेकिन वीआईपी एंगल पर सीबीआई जांच की मांग आज भी बनी हुई है।

यह अकेला मामला नहीं है। 3–5 दिनों के भीतर उत्तराखंड में तीसरी महिला हत्या के रूप में देहरादून के प़लटन बाज़ार में 2 फरवरी को 23 वर्षीय गुंजन श्रीवास्तव को सार्वजनिक रूप से गला रेतकर मार दिया गया, जबकि वह अपने काम पर जा रही थी। आरोपी, एक परिचित व्यक्ति, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, ने उस पर हमला किया और वह वहाँ ही खून से लथपथ गिर गई। यह घटना सुबह करीब 10 बजे घटी, जब बाज़ार भीड़‑भाड़ वाला था।

इन घटनाओं के बीच यह परिदृश्य स्पष्ट होता है कि संवेदनशीलता केवल घटना‑विशेष की प्रतिक्रिया नहीं रही, बल्कि एक प्रणालीगत समस्या से ग्रस्त है। उत्तराखंड में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या में वृद्धि के साथ ही समाज में भय, असुरक्षा और विभाजन की भावना भी बढ़ी है। एनसीआरबी और स्थानीय पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराध की संख्या में पिछले 5 वर्षों में निरंतर वृद्धि हुई है। बलात्कार, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा, पीछा करना और आत्म‑सम्मान से जुड़ी घटनाओं में बढ़ोतरी केवल कानूनी आंकड़ा नहीं है, यह सामाजिक असहिष्णुता की दर का भी सूचक है।

संवेदनशीलता के क्षरण का एक मुख्य कारण सामाजिक ढांचे का टूटना और पारिवारिक समर्थन का कमजोर पड़ना है। उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर युवा पलायन और रोज़गार की कमी के कारण कई परिवारों के संरचनात्मक तंतु कमजोर हुए हैं। गाँवों और कस्बों में सामाजिक निगरानी कम हो गई है, और शहरों में अपरिचित माहौल में रह रही महिलाएँ स्वयं को असुरक्षित महसूस करती हैं। जब पारिवारिक व सामाजिक नेटवर्क टूटता है, तब महिलाओं पर होने वाले अपराधों का जोखिम बढ़ता है क्योंकि वे अकेली पड़ जाती हैं।

दूसरी बड़ी समस्या कानून और प्रक्रिया की जटिलता है। कई मामलों में पीड़िताएँ डर, सामाजिक बदनामी और न्याय प्रक्रिया की लंबी अवधि के कारण शिकायत दर्ज़ नहीं कर पातीं। गुंजन श्रीवास्तव के मामले में भी हम देखते हैं कि उसने अपने हमलावर के खिलाफ केवल दो दिन पहले ही पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, और फिर भी उसे सुरक्षा नहीं मिल पाई।

तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा और लैंगिक संवेदनशीलता की कमी है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लैंगिक सम्मान, सहमति और महिलाओं की सुरक्षा जैसे विषय परंपरागत पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किए गए हैं या उनका प्रभाव सीमित है। सामाजिक माध्यमों पर महिलाओं के प्रति जारी दुराग्रह और पुरुष प्रधानता सामाजिक मान्यताओं में भी पैठ बना रही है, जो अपराध की दर को बढ़ावा देती है।

उत्तराखंड सरकार ने महिला सुरक्षा के लिए कई योजनाएँ और हेल्पलाइन सेवाएँ लागू की हैं, लेकिन इनका प्रभाव सीमित और अपर्याप्त प्रतीत होता है। पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी, त्वरित सुनवाई, त्वरित न्याय और पीड़िता‑मुखी समर्थन प्रणाली अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाई है। प्रशासन में संवेदनशीलता का अभाव, घटना के तुरंत बाद की धीमी प्रतिक्रिया और दुर्घटनाओं के बाद की प्रक्रिया की जटिलता, जनता के भरोसे को कम कर रही हैं।

एक स्वस्थ समाज तभी बनता है जब महिलाओं को न केवल कानूनी सुरक्षा मिले, बल्कि सामाजिक सम्मान, आर्थिक अवसर और समान व्यवहार की संस्कृति भी विकसित हो। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि यहाँ प्राकृतिक कठिनाइयाँ, सीमित संसाधन और कमजोर सामाजिक रीति‑रिवाज़ एकीकृत चुनौती बनाते हैं। लेकिन यही वजह है कि महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ़ पुलिस या सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं रह जाती – यह समाज की साझा जिम्मेदारी बन जाती है।

कहा जा सकता है कि उत्तराखंड में महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता का क्षरण केवल संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक, प्रशासनिक, न्यायिक और शिक्षा‑संबंधी कारणों का मिश्रण है। जब तक हम इन मुद्दों पर सामूहिक रूप से ध्यान नहीं देंगे, महिलाओं के खिलाफ बढ़ती घटनाओं की संख्या केवल बढ़ती ही जाएगी। आज समय है कि हम संवेदनशीलता को फिर से अपने सामाजिक मूल्यों का अभिन्न अंग बनाएं, क्योंकि महिलाएँ हमारी बहन, बेटी और माँ ही नहीं हैं, बल्कि समाज की सच्ची धरोहर हैं।

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