ग्रामोदय से भारत उदय

ग्रामोदय से भारत उदय

हमारी पंचायत

ग्राम उदय या ग्राम विकास केवल वोट मात्र के लिए नहीं चाहिए जैसा की अभी तक की अधिकतर योजनाओं या नीतियों के तहत होता आया है। पंचायती राज व्यवस्था के पास ग्रामउदय की चाबी है।

संवैधानिक व्यवस्था और पंचायती व्यवस्था से जुड़े प्रावधानों को देखें तो पंचायतीराज संस्थाओं को भारतीय संविधान ने संवैधानिक अधिकार और थोड़ी बहुत वित्तीय शक्तियां प्रदान कर दीं लेकिन योजनाएं बनाने और उन्हें लागू कराने का काम सरकारों और उनकी नौकरशाही से लेकर कर्मचारी वर्ग के हाथों में ही केन्द्रित रहा।

पंचायती राज संस्थाओं की इस संदर्भ में भूमिका को अस्पष्ट रखा गया। इन संस्थाओं के लिए न ही मानव बल को लेकर कोई दिशा-निर्देश तय हुए हैं और न ही उनसे जुड़े कामों को लेकर कोई स्पष्ट तस्वीर पेश की गई। संविधान की 11 वीं अनुसूची में दिए गए 29 विषयों को जोड़ते हुए राज्य के 13 विभागों में तीनों स्तर की पंचायतों को शक्तियां प्रत्यायोजित की गई हैं।

बावजूद इसके ढेरों ख़ामियाँ हैं जिनमें सबसे बड़ी बात यह सामने आई है कि अधिकतम विभागों में उन संस्थाओं के लिए फंड ही नहीं हैं। इस बिंदु पर सरकार की तरफ से कोई दिशा-निर्देश नहीं हैं।

दूसरी समस्या यह है कुछ विभागों ने उन शक्तियों का बँटवारा अलग-अलग स्तर पर नहीं किया गया है जिससे यह भ्रम बना हुआ है कि किस स्तर पर कौन सा कार्य किया जाएगा। 12वीं पंचवर्षीय योजना के कार्य समूह ने पंचायती राज संस्थाओं और ग्रामीण शासन तथा अन्य समीक्षाओं में इसकी प्रगति को नितांत अपर्याप्त पाया है। इस अपर्याप्तता के मुख्य तीन कारक हैं- निधि, कार्य और अधिकारी। सभी जानते हैं कि बिना निधि के कार्यों का अंतरण व्यर्थ है।

पंचायती राज संस्थाओं को केन्द्र सरकार से बहुत बड़ी धनराशि राज्य सरकार के विभागों या स्थानीय प्रशासन के माध्यम से मिलती है लेकिन पंचायतीराज संस्थाओं को अक्सर यह पता नहीं होता कि उन्हें कितना धन मिलेगा और कब मिलेगा। स्पष्टता के अभाव से योजना बनाने की क्षमता और कार्यों के निधियन में बाधा पहुँचती है। कुछ राज्य सरकारें इस प्रक्रिया को कारगर बनाने का प्रयास कर रही हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राज्य सरकारें पंचायती राज संस्थाओं को बहुत कम धन देती हैं।

पंचायती राज संस्थाओं के रूप में राजस्व संसाधन भी अपर्याप्त होते हैं जो उन्हें प्रभावी निकाय बनने से रोकते हैं। आंशिक रूप से इसका कारण संसाधन जुटाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। यह तो रहा सरकार का दोष लेकिन सबसे बड़ी दोषी सरकारें और प्रशासनिक व्यवस्था है, जो एक रणनीति के तहत पंचायत में चुने हुए ईमानदार प्रतिनिधियों को भी भ्रष्ट बनती है।

गौरतलब है कि त्रि स्तरीय पंचायत व्यवस्था में चुने हुए प्रतिनिधियों को आरम्भ से ही नाम मात्र का वेतन दिया जाता है जबकि ज़िम्मेदारियों का इतना बोझ लाड दिया गया है कि वह अपने पारिवारिक दायित्व के निर्वहन में भी असमर्थ हो जाते हैं। ऐसे में तंत्र ने एक फार्मूला निकला है कि सरकार द्वारा पंचायतों को जो योजनाएं दी जाती है उसमें अपना कमीशन या हिस्सेदारी वसूल करें अर्थात एक ईमानदार आदमी को जानबूझकर भ्रष्ट बनाया है।

ऐसे में अधिकांश पंचायत प्रतिनिधि इसलिए चुनाव नहीं लड़ते कि उन्हें गाँव का विकास करना है बल्कि इसलिए लड़ते हैं क्योंकि उन्हें पंचायती व्यवस्था के तहत प्राप्त धन का बड़ा हिस्सा अपनी निजी अर्थव्यवस्था से जोड़ना है, इसमें उन्हें सहयोग देती है ग्रामीण जनता। यद्यपि वह पंचायती संस्थाओं की अक्षमता, गैर-जवाबदेही वाले आचरण, अकुशलता से पीड़ित होती है पर अंततः वह ऐसे ही प्रत्याशियों को चुन लेती है जो उन्हें छोटे-मोटे लालच देने और झूठ बोलने में कुशल होते हैं।

जहां तक कार्य का सवाल है तो कुछ राज्यों ने दूसरों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है पर कुल मिलाकर राज्य सरकारों ने पंचायती राज संस्थाओं के लिए संविधान में परिकल्पित जिम्मेदारियों या कार्यों की शृंखला को लागू करने की अनिच्छा जाहिर की है। हरियाणा, कर्नाटक, केरल और सिक्किम ने सभी 29 विषयों के हस्तांतरण के लिए आदेश जारी किए हैं जबकि शेष ने केवल कुछ विषयों के लिए ही आदेश जारी किए।

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के दस्तावेज़ों के अनुसार ज्यादातर राज्यों के पंचायती राज अधिनियमों में पंचायती राज संस्थाओं की गतिविधियों और बजट की समीक्षा तथा अनुमोदन (या अस्वीकृति), स्वीकृत प्रस्तावों और निर्वाचित अधिकारियों को निलंबित करने तथा सत्ता व कार्यों को वापस लेने संबंधी अधिकार अब भी बने हुए हैं।

इसका अर्थ यह है लगभग सभी राज्यों में पंचायतीराज संस्थाओं के ऊपर जिला कलेक्टर, संभागीय आयुक्त या राज्य सरकार स्वयं अपने अधिकार का प्रयोग करती हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 73वें संविधान संशोधन अधिनियम की भावना की बड़े पैमाने पर उपेक्षा की गयी है-अधिनियम की कल्पना से इतर पंचायती राज संस्थाएं द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के शब्दों में अनुमोदन कार्यात्मक क्षेत्र के अंतर्गत काम कर रही है।

चार राज्यों-केरल, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में जहां सभी ने हस्तांतरण के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है- एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार कानून और व्यवहार दोनों ही में जिम्मेदारियों का अधिकतर काम राज्य के पास होता है। राज्य निचले स्तर को प्रशासनिक ज़िम्मेदारी दे देते हैं लेकिन स्वशासन की स्वायत्तता इकाई के रूप में पंचायती राज संस्थाओं को बहुत कम देते हैं।

पंचायती राज संस्थाओं को जो कुछ काम मिलते हैं वे बहुत कम महत्व वाले होते हैं। जो ज़िम्मेदारी पंचायती राज संस्थाओं को मिलती भी है वह प्रत्याशियों की अयोग्यता और गाँव की जनता की अनभिज्ञता या उदासीनता की भेंट चढ़ जाती है।

ऐसे में ग्रामोदय कैसे संभव होगा? असंभव तो कुछ भी नहीं है पर इसके लिए सरकारों को नुमाइश प्रक्रिया से अलग गाँवों के लिए कुछ करना होगा और गाँवों की जनता को अपने अधिकारों तथा सरकारों से गाँव के लिए भेजे गए धन की एक-एक पाई की जानकारी रखनी होगी। उन्हें गाँव की पंचायतों को गाँव के विकास के लिए चुनना होगा और निजी हितों को दरकिनार करना होगा।

यह कार्य आज के भारतीय समाज में, जहां संवेदनाएं कमजोर हो गई हों, मन कलुषिट और मस्तिष्क निजी अनुलाभों पर ही कार्य करते हों, मुश्किल है पर यदि सामूहिक प्रयास हो तो इस ट्रैक से निकल कर सही दिशा में लाया जा सकता है।

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