हिमाचल की 3577 पंचायतों में बदलेगा शासन मॉडल

हिमाचल की 3577 पंचायतों में बदलेगा शासन मॉडल

हमारी पंचायत, शिमला
हिमाचल प्रदेश की ग्रामीण शासन व्यवस्था 1 फरवरी से एक बड़े बदलाव के दौर में प्रवेश करने जा रही है। प्रदेश की सभी 3577 ग्राम पंचायतों में वर्तमान प्रधानों, उपप्रधानों और पंचायत सदस्यों का पांच वर्षीय कार्यकाल 31 जनवरी को पूरा हो रहा है। इसके साथ ही उनकी सभी वैधानिक शक्तियां स्वतः समाप्त हो जाएंगी।

प्रदेश में पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव अभी तक नहीं हो पाए हैं। वहीं, हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पंचायत चुनाव हर हाल में 30 अप्रैल से पहले पूरे किए जाएं। इस अंतराल में प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिए सरकार हिमाचल प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम की धारा 140 (3) के तहत वैकल्पिक व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है।

प्रस्ताव के अनुसार, पंचायत स्तर पर विकास कार्यों और प्रशासनिक निर्णयों की जिम्मेदारी या तो तीन सदस्यीय कमेटी को सौंपी जाएगी या फिर सीधे पंचायत सचिव को अधिकार दिए जाएंगे। इस संबंध में फाइल सरकार के पास पहुंच चुकी है और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के दिल्ली से लौटने के बाद इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

यह व्यवस्था प्रदेश के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि 73वें संविधान संशोधन के बाद पहली बार ऐसा होगा जब एक साथ सभी पंचायतों में चुने हुए जनप्रतिनिधियों की जगह प्रशासनिक तंत्र को शक्तियां सौंपी जाएंगी। नियमों में इस प्रावधान का स्पष्ट उल्लेख है, जिसके तहत कार्यकाल समाप्त होते ही पंचायतों की शक्तियां स्वतः वैकल्पिक व्यवस्था के अधीन चली जाती हैं।

हालांकि, इससे पहले भी सीमित स्तर पर ऐसी स्थिति देखने को मिली है। कोविड काल के दौरान लाहौल-स्पीति के लाहौल ब्लॉक और चंबा के पांगी ब्लॉक में पंचायत चुनाव विलंबित होने पर तीन सदस्यीय कमेटियों का गठन किया गया था। वर्ष 2021 में जारी अधिसूचना के तहत इन कमेटियों ने चुनाव होने तक पंचायतों का कार्य संभाला था। लेकिन पूरे प्रदेश में एक साथ यह व्यवस्था लागू होना पहली बार है।

नियमों के अनुसार, पंचायत समितियों की शक्तियां संबंधित खंड विकास अधिकारी (BDO) को और जिला परिषदों की शक्तियां जिला पंचायत अधिकारी (DPO) या अतिरिक्त उपायुक्त (ADC) को सौंपी जा सकती हैं। वर्तमान में प्रदेश में 92 पंचायत समितियां और 249 जिला परिषद वार्ड हैं, जिनकी प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।

इधर, पंचायत प्रधानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में सचिवालय में मुख्यमंत्री से मुलाकात कर चुनाव संपन्न होने तक कार्यकाल बढ़ाने की मांग भी रखी थी। अब यह देखना होगा कि सरकार नियमों के अनुसार निर्णय लेती है या फिर जनप्रतिनिधियों की मांग पर कोई अपवाद किया जाता है। अंतिम फैसला पूरी तरह सरकार के विवेक पर निर्भर करेगा।

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