हिमाचल पंचायत पुनर्गठन पर हाईकोर्ट सख्त

हिमाचल पंचायत पुनर्गठन पर हाईकोर्ट सख्त

600 नई पंचायतों के प्रस्ताव लंबित, चुनाव से पहले प्रक्रिया पर उठे सवाल; सरकार ने डीसी को रोस्टर और समीक्षा के निर्देश दिए
हमारी पंचायत, शिमला

हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले पंचायतों के पुनर्गठन का मुद्दा गरमा गया है। एक ओर राज्य में करीब 600 नई ग्राम पंचायतों के गठन के प्रस्ताव लंबे समय से लंबित हैं, वहीं दूसरी ओर हाईकोर्ट ने पुनर्गठन से जुड़ी अधिसूचना को रद्द करते हुए सरकार की प्रक्रिया पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। अदालत की सख्त टिप्पणी के बाद सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर प्रस्तावों की समीक्षा तेज कर दी है और सभी जिलों के उपायुक्तों को आवश्यक निर्देश जारी किए हैं।

दरअसल प्रदेश के विभिन्न जिलों से पंचायतों के पुनर्गठन और नई पंचायतों के गठन के लिए बड़ी संख्या में आवेदन सरकार के पास पहुंचे हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूदा पंचायतें भौगोलिक रूप से बहुत बड़ी हैं और गांवों के बीच दूरी भी अधिक है। ऐसे में प्रशासनिक सुविधा और विकास योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए नई पंचायतों के गठन की मांग लंबे समय से उठती रही है। इसी आधार पर विभिन्न जिलों से लगभग 600 नई पंचायतों के गठन के प्रस्ताव भेजे गए थे, लेकिन इन पर अंतिम निर्णय अब तक नहीं हो पाया है।

इसी बीच पंचायत पुनर्गठन से संबंधित अधिसूचना को लेकर मामला न्यायालय पहुंच गया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि पंचायतों के सीमांकन और पुनर्गठन की प्रक्रिया किन मानकों के आधार पर की गई। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पुनर्गठन की प्रक्रिया पारदर्शी और तय नियमों के अनुरूप नहीं है तो इससे पंचायत चुनाव की निष्पक्षता पर भी असर पड़ सकता है। अदालत की कड़ी टिप्पणी के बाद संबंधित अधिसूचना को निरस्त कर दिया गया, जिससे पुनर्गठन की प्रक्रिया फिलहाल अटक गई है।

हाईकोर्ट के इस रुख के बाद सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता बढ़ा दी है। पंचायती राज विभाग के सचिव ने सभी जिलों के उपायुक्तों (डीसी) को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि वे अपने-अपने जिलों में लंबित प्रस्तावों की विस्तार से जांच करें। साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि प्रस्तावित पंचायतों के गठन में जनसंख्या मानक, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक सुविधा जैसे सभी जरूरी मानदंडों का पालन किया जाए।

सरकार की ओर से यह भी संकेत दिए गए हैं कि प्रस्तावों की जांच पूरी होने के बाद पंचायतों के लिए आरक्षण रोस्टर भी जारी किया जाएगा। पंचायत चुनाव में प्रधान, उपप्रधान और वार्ड सदस्य के पदों का निर्धारण इसी रोस्टर के आधार पर किया जाता है। इसलिए रोस्टर जारी होना चुनावी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नई पंचायतों के गठन से ग्रामीण प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। छोटी पंचायतों के बनने से स्थानीय स्तर पर विकास योजनाओं की निगरानी बेहतर हो सकेगी और ग्रामीणों को सरकारी सेवाएं भी अधिक आसानी से मिल पाएंगी। हालांकि न्यायालय की सख्ती के बाद अब सरकार को पूरी प्रक्रिया को नियमों और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाना होगा।

फिलहाल प्रदेश में पंचायत पुनर्गठन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। एक ओर नई पंचायतों के गठन की मांग कर रहे ग्रामीणों की उम्मीदें बनी हुई हैं, वहीं दूसरी ओर न्यायालय की सख्ती ने सरकार को प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा करने के लिए मजबूर कर दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार लंबित प्रस्तावों की जांच पूरी कर कब नई अधिसूचना और आरक्षण रोस्टर जारी करती है।

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