हमारी पंचायत, देहरादून
उत्तराखंड में पंचायत चुनावों की सरगर्मी के बीच एक अहम सवाल लगभग हाशिये पर चला गया है—क्या पंचायत प्रतिनिधियों के पास आज भी वह अधिकार बचे हैं, जिनकी परिकल्पना संविधान के 73वें संशोधन में की गई थी? गांवों की सरकार कहे जाने वाले पंचायती तंत्र की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि वर्षों में पंचायत प्रतिनिधियों की जिम्मेदारियां तो लगातार बढ़ी हैं, लेकिन उनके निर्णय लेने के अधिकार क्रमशः सिमटते चले गए हैं। इसका सीधा असर न केवल पंचायतों की कार्यक्षमता पर पड़ा है, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र की जड़ों को भी कमजोर किया है।
राज्य में लगभग साढ़े सात हजार ग्राम पंचायतें हैं, जिनके माध्यम से ग्रामीण विकास की योजनाओं को लागू किया जाना है। कागजों में पंचायतों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, स्वच्छता और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों से जुड़ी योजनाओं में अहम भूमिका दी गई है। हालांकि व्यवहारिक स्तर पर अधिकांश योजनाओं की रूपरेखा, स्वीकृति और क्रियान्वयन पर ब्लॉक और जिला स्तर की अफसरशाही का नियंत्रण बना हुआ है। पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका कई मामलों में केवल प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने या पहले से तय योजनाओं को गांव में लागू कराने तक सीमित रह गई है।
वित्तीय अधिकारों का सवाल सबसे अहम बनकर उभरा है। 15वें वित्त आयोग के तहत पंचायतों को मिलने वाली धनराशि सीधे खातों में तो भेजी जाती है, लेकिन उसके उपयोग के लिए तकनीकी स्वीकृति, ई-टेंडर प्रक्रिया और विभागीय दिशा-निर्देश इतने जटिल हैं कि वास्तविक निर्णय पंचायत नहीं, बल्कि ब्लॉक कार्यालय में लिए जाते हैं। पंचायती राज विभाग से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में राज्य की करीब 60 प्रतिशत ग्राम पंचायतें ऐसी रहीं, जिन्होंने किसी भी बड़ी विकास योजना का स्वतंत्र प्रस्ताव नहीं दिया। अधिकांश कार्य ऊपर से तय योजनाओं के तहत ही किए गए।
मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना, जिसे ग्राम पंचायत आधारित माना जाता है, वहां भी यही स्थिति देखने को मिलती है। जॉब कार्ड सत्यापन से लेकर भुगतान और सामग्री खरीद तक की प्रक्रिया ब्लॉक स्तर पर नियंत्रित होती है। प्रधान और ग्राम पंचायत को कार्य की निगरानी की जिम्मेदारी तो दी जाती है, लेकिन भुगतान और स्वीकृति का अधिकार उनके पास नहीं होता। ऐसे में यदि काम में देरी होती है या मजदूरी समय पर नहीं मिलती, तो नाराजगी का सामना सबसे पहले पंचायत प्रतिनिधियों को ही करना पड़ता है।
कर्मचारियों पर नियंत्रण का अभाव भी पंचायतों को कमजोर करता है। पंचायत सचिव, ग्राम विकास अधिकारी, रोजगार सेवक या तकनीकी सहायक – इनमें से कोई भी सीधे पंचायत के अधीन नहीं होता। उनकी जवाबदेही विभागीय अधिकारियों के प्रति होती है, जबकि गांव की जनता पंचायत प्रतिनिधियों से जवाब मांगती है। यह असंतुलन पंचायत प्रतिनिधियों को बीच में फंसा देता है, जहां अधिकार न होने के बावजूद उनसे हर समस्या का समाधान अपेक्षित होता है।
ग्राम सभा, जिसे लोकतंत्र की सबसे निचली और मजबूत इकाई माना गया था, आज औपचारिकता बनती जा रही है। कई क्षेत्रों में ग्राम सभाओं में उपस्थिति 15 से 20 प्रतिशत से अधिक नहीं रह गई है। फैसले पहले ही तय हो जाते हैं और ग्राम सभा में केवल अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी की जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्राम सभा की कमजोर होती भूमिका स्थानीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है, क्योंकि यही मंच जनता और शासन के बीच सीधा संवाद स्थापित करता है।
इस पूरी व्यवस्था का असर पंचायत चुनावों पर भी दिखाई दे रहा है। कई क्षेत्रों में सक्षम और शिक्षित लोग पंचायत चुनाव लड़ने से दूरी बना रहे हैं, क्योंकि बिना अधिकारों के जिम्मेदारी उठाना उन्हें निरर्थक लगता है। पंचायत प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे औपचारिक पद में बदलता जा रहा है, जहां वास्तविक शक्ति प्रशासनिक ढांचे के पास सिमटती जा रही है।
नीतिगत स्तर पर विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करना है, तो केवल चुनाव कराना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए वास्तविक वित्तीय विकेंद्रीकरण, पंचायत कर्मचारियों की जवाबदेही पंचायत को सुनिश्चित करना, ग्राम सभा को फिर से निर्णायक मंच बनाना और अफसरशाही व जनप्रतिनिधियों के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है। अन्यथा पंचायतें केवल योजनाओं को गांव तक पहुंचाने वाली डाक व्यवस्था बनकर रह जाएंगी और स्थानीय स्वशासन की मूल भावना खो जाएगी।
