परिवर्तन प्रकृति का नियम है। दिन, महीने, साल और शताब्दियाँ बदलती हैं तो संस्कृति और व्यवहार में भी अंतर आता है। महज़ बीते दो दशक में या कह लीजिये 1990 के दशक और फिर 2000 के बाद, जिस तरह पहाड़ों के सांस्कृतिक व्यवहार में बदलाव आए हैं उसके हम साक्षी हैं। बात वैवाहिक आयोजनों में नाच – गान की करें तो सन 2000 तक महासू क्षेत्र में शादी की रात को घर के अंदर मुंज़रा लगता था, पूरी रात नाचते थे, शुरुवात जहाँ भक्ति गीत से होती थी वहीं प्रभात में सीतारण (सीता हरण) “रोयणा रात भियाणी” (भोर में गाए जाने वाला विशेष गीत) और बाद में लगता था “छो भाई छांईंया..। जिसमें मेहमानों के साथ – साथ मेज़बान, काम करने वाले सभी युवा, बुजुर्ग आदि नाचते गाते थे। यह आयोजन का आखिर कार्यक्रम होता था।
मूलतः यह सेट फॉरमेट था और सब मैन्युअल होता था, मसलन गाना, बजाना, कोरस आदि। हालाँकि उस दौर में हुई शादी की कैसेट्स /सीडी में यह देखने को मिल जाएगा। ढोलक- ढोलकी, खंजरी, हुड़की कहीं हारमोनियम के साथ लगा मुंज़रा, नृतक और दर्शक सभी को आनंदित करता था। लकड़ी के घरों में कोरस दे रहे साथी, हाथ से ताली, लकड़ी से बजती कासे की थाली, (कोरस में सबका एक साथ गाना) राग – ताग (पैर की एड़ी से मेड़ ‘फ़र्श’ पर गाने की धुन में थाप लगाना) से ऐसा म्यूज़िक बजाते थे नृतक के साथ-साथ और गाने-बजाने के साथ – साथ ही झूमते हुए लुत्फ़ उठाते थे। अच्छा डांस करने वालों की बाकायदा नाचते हुए पैसे देकर हौसला अफ़ज़ाई की जाती थी। लड़किया खूब नाचती थी लेकिन औरते मुंजरे में अमूमन कम नाचती थी।
मुझे याद है सन 1997 दिसंबर में जब भाई की शादी (बावर जौनसार) के गांव चिल्हाड़ से भट्टाड़ जुब्बल में हुई तो रात को घर के बड़े हॉल में दुल्हन के साथ आए नृत्य और संगीत प्रेमी चिल्हाड़ वालों का मुंज़रा लगा था। बगल वाले कमरे में मामा लोग (भगवत – पंचगांई), एक अलग कमरे में डगोली (बंगाण) वालों की नाटी चला रही थी और एक कमरे में अन्य रिश्तेदार (चौपाल, रोहड़ू, जुब्बल) स्थानीय लोग अपने -अपने ग़ाज़े – बाज़े के साथ पूरी रात नाच-झूम रहे थे। आधी रात के बाद एक कमरे से बिना म्युज़िक के जोर -जोर से नाचने और गाने की आवाज आने लगी, उत्सुकता से काफी लोग उस कमरे की ओर गए, लेकिन कमरा अंदर से बंद था, बाद में पत्ता चला कि बंद कमरे में औरतों की नाटी चल रही है। यानी एक झिझक थी।
सन 2000 के बाद शुरू हुए DJ के दौर ने इस झिजक को दूर कर दिया। 23 अक्टूबर 2023 को चाचा जी के बेटे अनुज विक्रांत (अंकु)के विवाह तक पहुँचते, इसमें दिन -रात का अंतर आ गया है। रात के तीन बजे तक डीजे बजता रहा और गीतों के रागी दर्शक और नटवे लुत्फ़ उठाते रहे। युवा पीढ़ी से इस विषय में बात हुई तो उनका कहना था.. “कि वो भी कोई दौर था, कोई मज़े थी, मुंजरे (महफ़िल) में एक नाच रहा है और बाकी सब दर्शक बनकर देखते रहे। अब आज का दौर देखिए, जिसका मन करे.. बच्चा, बुज़ुर्ग, मर्द, औरत मिलकर सब मज़े लेते हैं चाहे अकेले नाचे या समूह में और थक गए तो आराम करो। न गाने याद करने की टेंशन और न गला ख़राब होने का डर।”
निसंदेह डीजे ने विलुप्त होती लोकगीत और नृत्य की संस्कृति को पुनर्जीवित किया है। भेदभाव को मिटाया है, बेझिजक कई पीढ़ियां बच्चे, बुज़ुर्ग, मर्द -औरत युवा सब साथ में नाचते गाते हैं। हालांकि नए दौर के बहुत बच्चे गाने के बोल को नहीं समझते लेकिन नाचते और झूमते जमकर है। यकीनन नाटी के शौक़ीन युवा जमकर नाचते हैं जिन्हें देखने में भी आनंद आता है। महासुई लोक गायक डॉ के एल सहगल जी का गीत है.. “ऐस मुंज़रे जुग ज़माना बे छेड़ू सौज ला गोरखिये”.. जिसमें मुज़रे का सुन्दर चित्रण किया गया है। सिरमौर, जौनसार- बावर, बंगाण और चौपाल क्षेत्र में आज भी विवाह आदि आयोजनों में मुंजरा – महफ़िल सजती हैं और लोग ख़ूब रौनक लगाते हैं। जिसमें मेहमानों के साथ – साथ मेज़बान, काम करने वाले सभी युवा, बुजुर्ग आदि नाचते गाते थे। यह आयोजन का आखिर कार्यक्रम होता था। हमारी संस्कृति हमारी धरोहर है, इस विरासत को सहेजना हमारा कर्तव्य है।
@एस पी शर्मा

