दिल्ली दूर है, मतलब अहंकार की पराकाष्टा। आप जितने करीब जाओ वो उतनी दूर नज़र आएगी। दिल्ली दूर होने के कई माईने हैं। दिल्ली उस पहाड़ के अहंकार की तरह है जहां पहुँच कर दूसरा पहाड़ और ऊँचा दिखाई देने लगता है। हाटु टीर पर पहुंचो तो चूड़धार ऊपर लगता है, चूड़धार चङो तो श्रीखंड पर्वत ऊपर दिखता है, श्रीखंड पर्वत तय करो तो सामने अनंत हिमालय है । अहंकार पर अहंकार बढ़ने लगता है।
दिल्ली दूर है…. अपने नाम के माफिक कहावत सटीक बैठती है। जिसका अपना कोई वज़ूद नहीं। न अपना मौसम न मिजाज़। न संस्कृति न संस्कार। न आचार न व्यवहार। पहाड़ ठन्डे हुवे तो दिल्ली कांपने लगती है रेगिस्तान गर्म हुवा तो दिल्ली हांफने लगती है। माने कंप -कंपाने वाली सर्दी और देह गलने वाली गर्मी।

हया-हवा, दया-दवा सब में मिलावट, ऑटोवाले के मीटर में और पैट्रोल पम्प के लीटर में हेराफेरी। यमुना के पानी में और तरुणों की जवानी में न जाने कहां से इतना कचरा भर गया है कि बार-बार मुल्क को शर्मसार होना पड़ता है।
वाकया सन 1999 का है, पत्रकारिता की पढाई के दरमियान दोस्तों के साथ कुरुक्षेत्र से दिल्ली आगमन हुआ फिर दिल्ली दर्शन भी। आशियाना दिल्ली के मयूर विहार फेज़-1 में होने पर यमुना जी के दर्शन, जल स्पर्श व् आचमन की तम्मना हुई। मित्र ने कहा, “यंहा यमुना बहुत मैली है मित्र ! आप आचमन तो छोड़िये छू भी नहीं सकते, बहुत महकती है छी….।”
“अरे सर.. ऐसा मत कहिये, यमुना जी में मेरे घर के चश्मे का पानी आता है।” उन्होंने सवाल दागा तो मैंने बताया कि मेरे प्याऊ का पानी जिस ‘पब्बर नदी’ में बहता है वो अगणित क्यारियों (धान की खेती) को सींचती, असंख्य घराटों (पन चक्की) को चलाती, कई जल विधुत परियोजनायें और उठाऊ पेयजल संयंत्र मयस्सर करवाती हुई अपने स्वभाव के विपरीत टोंस नदी में समाकर यमुना में पहुँचती है।
भागीरथी की धारा जब गंगोत्री से बह कर समुंद्र तक अपने वज़ूद को नहीं छोड़ती तो यमुना में भी वो पब्बर वाली तासीर होनी चाहिए। खैर, यमुना तीर पहुंचे तो सारे मुगालते दूर हो गए। मेरा वो भक्तिभाव और प्रेम, ऐसे करुणामय हुआ जैसे माशूका के कुरूप होने पर आशिक का इश्क…।

