आजकल सोशल मीडिया में अनेक पोस्ट देखने को मिल रही हैं, जिसमें नए-नए पीएचडी धारक सामने आ रहे हैं। जिन्होंने कड़ी मेहनत और लगन से पीएचडी – शोध किया है और शोधलेख तैयार किया है उन्हें बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं!
हालांकि इसका स्याह पहलू लंबे समय से चल रहा है। जिसमें पीएचडी के मानक कितने पूरे किए जा रहे हैं इसको लेकर बारहा सवाल उठते रहे हैं। अर्थात.. पीएचडी के दौरान उन्होंने जो शोध किया है उसकी क्या निष्पत्ति (आउटपुट) है..?
वह शोधलेख कहां पढ़ाया जा रहा है..?
शोधलेख किस जर्नल में प्रकाशित किया गया था और उस जर्नल की कितनी प्रमाणिकता है..?

गौरतलब है कि पीएचडी जमा कराने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक दिशानिर्देश जारी किया है। पीएचडी जमा कराने के लिए जारी दिशानिर्देश के अनुसार छात्र को अपना थिसिस जमा कराने से पहले अपना एक शोध आलेख उस विषय से संबंधित नामी जर्नल में प्रकाशित कराना होता है। वह शोध आलेख विषय के जानकार विद्वानों द्वारा जांच-परख करने के बाद ही जर्नल में प्रकाशित होता है।
स्मरण रहे कि पीएचडी के नाम पर आज बहुतेरे विश्वविद्यालय और कतिपय गाइड संदेह के दायरे में हैं। क्योंकि ऐसी कई यूनिवर्सिटीज है जहां हर साल पीएचडी के लिए प्रवेश परीक्षाएं होती है लेकिन विभाग यह स्पष्ट नहीं करते कि उनके विभाग में कितनी पीएचडी सीट उपलब्ध है।
परिणाम साफ़ है कि यूनिवर्सिटी में पीएचडी कमाई का धंधा बन चुका है। और रही बात गाइड की.. तो जिनकी अपनी पीएचडी का कोई मानक नहीं होगा उसके निर्देशन में शोध करने वाला किस स्तर का होगा, स्वत: जाना जा सकता है।
पीएचडी की डिग्री कुछ खास लोगों में रेवड़ियों की तरह बांटने की खबरें पढ़ने को मिलती रहती हैं और पूरे मामले में सेटिंग-गेटिंग व लेनदेन भी सामने आते रहे हैं।
मैं व्यक्तिगत अनुभव से लिख रहा हूं, मेरे कई ऐसे मित्र हैं जिन्होंने पीएचडी की है, उनमें कुछ के शोध ऐसे हैं जिन्हें दो – चार दिन आराम से घर में बैठ कर लिखा जा सकता है, जिसमें विषय और भाषा ज्ञान का अभाव साफ झलकता है और कुछ ऐसे भी डॉक्टर साहब हैं जिन्होंने अपनी पीएचडी थिसिस दूसरों से लिखवाई है। उन थीसिस को देख कर दु:ख होता है कि किस तरह सेटिंग-गेटिंग से गाइड ने उन्हें पीएचडी की उपाधि प्रदान की।
जब देश में पीएचडी जैसी डिग्री का धंधा भी लेनदेन से चल रहा हो और नाम से पहले पीएचडी की आड़ में डॉ लिखना स्टेटस सिंबल बन गया हो उस शिक्षा प्रणाली का थोमस बैबिंगटन मैकाले ही भला करे।

