स्मार्ट सिटी की राह में देहरादून की टूटी उम्मीदें
हमारी पंचायत, देहरादून
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून इन दिनों एक अजीब विडंबना से जूझ रही है। एक ओर शहर को स्मार्ट सिटी मिशन और एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) समर्थित परियोजनाओं के तहत आधुनिक स्वरूप देने की कोशिश हो रही है, दूसरी ओर सड़कों की हालत इस कदर खस्ताहाल हो चुकी है कि कहीं सड़क पर गड्ढे हैं, तो कहीं गड्ढों में सड़क बची है। विकास की इन योजनाओं का खामियाजा सबसे ज्यादा आम जनता को उठाना पड़ रहा है।
गड्ढों का शहर बनता देहरादून
बरसात के दिनों में हालात और भी बिगड़ जाते हैं। माता मंदिर रोड, जीएमएस रोड, हरीद्वार बाईपास और मोथरावाला रोड पर स्थिति इतनी खराब है कि छोटे वाहन अक्सर गड्ढों में फंस जाते हैं। पैदल चलना मुश्किल हो जाता है।
स्थानीय निवासी अनिल शर्मा बताते हैं, “बरसात में सड़क पर पानी भर जाता है। हमें समझ ही नहीं आता कि सड़क कहां है और गड्ढा कहां। कई बार बाइक सवार और पैदल यात्री गिर चुके हैं।”

वहीं स्कूली छात्र सन्निहित शर्मा कहते हैं, “सड़कों में बने गड्ढों में पानी भर जाने से स्कूल आना-जाना खतरे से भरा हो गया है।”
स्मार्ट सिटी में स्मार्टनेस कहां?
स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य था कि एक ही बार सड़क की खुदाई हो और सभी आवश्यक सेवाएं—बिजली, पानी, टेलीकॉम—एक मल्टी-यूटिलिटी डक्ट के ज़रिए संचालित हों। लेकिन असलियत इसके बिल्कुल विपरीत है। पहले बिजली विभाग (UPCL) ने तारें भूमिगत करने के लिए सड़क खोदी। फिर जल संस्थान ने पाइप लाइन डालने के लिए वही सड़क उखाड़ी। उसके बाद टेलीकॉम कंपनियां अपने केबल बिछाने पहुंच गईं। नतीजा—एक ही सड़क को कई-कई बार खोदा गया और उसकी मरम्मत कभी ठीक से पूरी नहीं हो पाई।
अधूरी मरम्मत और हादसों का खतरा
आंकड़े बताते हैं कि 100 किलोमीटर से अधिक बिजली लाइनों को भूमिगत किया जा रहा है और अब तक करीब 65 किलोमीटर सड़कें बार-बार खोदी जा चुकी हैं। मानसून आने से पहले भी 35% सड़कों की मरम्मत अधूरी रह गई।
इसका सीधा असर सड़क सुरक्षा पर पड़ा है। जून से अगस्त 2025 के बीच शहर के अस्पतालों ने 200 से अधिक दुर्घटनाएं केवल गड्ढों और जलभराव की वजह से दर्ज की हैं। स्कूली बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह समस्या जानलेवा साबित हो रही है।
ठेकेदारों की मनमानी, प्रशासन की ढिलाई
खुदाई के बाद ठेकेदार अक्सर गड्ढों को मिट्टी डालकर अधूरा छोड़ देते हैं। बारिश होने पर मिट्टी धंस जाती है और सड़क और भी असमान हो जाती है। इस लापरवाही पर प्रशासन ने एक-दो कार्रवाई भी की—जैसे UPCL पर एक लाख का जुर्माना—but ज़मीनी स्तर पर इसका असर न के बराबर है।
समन्वय की कमी: समस्या की जड़
सिविल इंजीनियर अरुण रावत मानते हैं कि विभागों के बीच तालमेल की कमी ही असली वजह है। “यदि सभी विभाग मिलकर एक मास्टर प्लान पर काम करें, तो बार-बार खुदाई से बचा जा सकता है। लेकिन यहां एक विभाग काम पूरा करता है और दूसरा उसी सड़क को दोबारा खोद देता है।”
आर्थिक और सामाजिक नुकसान
सड़क मरम्मत पर पिछले दो सालों में 25 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं। बार-बार खुदाई से कुल परियोजना लागत 20–25% तक बढ़ गई है। खराब सड़कों के कारण ट्रैफिक धीमा हो गया है, ईंधन की खपत बढ़ गई है और व्यापारियों का कारोबार प्रभावित हो रहा है। लगभग 1,500 करोड़ रुपये की स्मार्ट सिटी परियोजना अब शहरवासियों की नजर में अपनी साख खो रही है।
जनता का गुस्सा और टूटा भरोसा
सोशल मीडिया पर “#SaveDoonsRoads” जैसे अभियान चल रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि स्मार्ट सिटी के नाम पर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल बना दी गई है। छात्रों को समय पर स्कूल पहुंचना भारी हो रहा है, व्यापारी ग्राहक खो रहे हैं और आम नागरिक गुस्से में हैं।
देहरादून की सड़कों की यह दुर्दशा केवल अव्यवस्था की कहानी नहीं है, बल्कि विकास के मॉडल पर उठता एक गंभीर सवाल भी है। स्मार्ट सिटी के नाम पर अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन यदि बुनियादी ज़रूरत—सुरक्षित और मजबूत सड़कें—ही पूरी न हों तो यह विकास अधूरा और खोखला साबित होता है। गड्ढों से भरी सड़कें हमें याद दिलाती हैं कि योजनाओं की सफलता केवल बजट और नीतियों पर नहीं, बल्कि ज़मीनी क्रियान्वयन और जिम्मेदारी तय करने पर टिकी होती है। सवाल यही है कि क्या देहरादून वास्तव में स्मार्ट सिटी बनेगा, या फिर गड्ढों के बीच खोया हुआ शहर बनकर रह जाएगा।

