एक शासनादेश, दो नियम: अटल आयुष्मान में उलझन

एक शासनादेश, दो नियम: अटल आयुष्मान में उलझन

राज्यपाल के शासनादेश से ऊपर कौनविभागीय निर्देश या अदृश्य आदेश’?

हमारी पंचायत, देहरादून

उत्तराखंड में स्वास्थ्य सुरक्षा की सबसे बड़ी सरकारी पहल अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना आज गंभीर सवालों के घेरे में है। जिस योजना को प्रदेश के हर परिवार के लिए “स्वास्थ्य सुरक्षा की मजबूत ढाल” बताया गया था, वही अब कई जिलों में भ्रम और विवाद का कारण बनती दिखाई दे रही है। एक ओर सरकार का आधिकारिक शासनादेश है, जिसमें योजना के प्रावधान स्पष्ट रूप से लिखे हुए हैं, दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ऐसे नियम लागू होते दिखाई दे रहे हैं जो उस आदेश से मेल ही नहीं खाते।

यही वजह है कि अब यह सवाल उठने लगा है कि आखिर योजना चल किस आधार पर रही है—राज्यपाल की स्वीकृति से जारी शासनादेश के आधार पर या फिर किसी विभागीय निर्देश के आधार पर, जो सार्वजनिक रूप से कहीं उपलब्ध ही नहीं है।

योजना का उद्देश्य: हर परिवार को स्वास्थ्य सुरक्षा

अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना को लागू करते समय सरकार ने इसे प्रदेश की सबसे व्यापक स्वास्थ्य योजना बताया था। इस योजना के तहत राज्य के सभी पात्र परिवारों को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का फैमिली फ्लोटर कैशलेस इलाज उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया।

यह योजना पहले से चल रही मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना (एमएसबीवाई) और यू-हेल्थ योजना को समाहित कर तैयार की गई थी। इसके साथ ही केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना से जुड़े परिवारों को भी इसमें शामिल किया गया। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार राज्य में लगभग 23 लाख परिवारों को इस योजना के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा गया था। इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए असीमित चिकित्सा सुरक्षा का प्रावधान भी रखा गया।

पुराने लाभार्थियों को भी बढ़ा कवरेज

योजना के संचालन आदेश में यह स्पष्ट किया गया था कि पहले से चल रही राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) और मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना से जुड़े परिवारों का कवरेज 1.75 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया जाएगा। इसके साथ ही पुराने कार्डों को भी मान्य रखने का निर्णय लिया गया ताकि पहले से लाभ ले रहे परिवारों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। हालांकि आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि कोई भी लाभार्थी दो योजनाओं का एक साथ दोहरा लाभ नहीं ले सकेगा।

पहचान की प्रक्रिया: शासनादेश क्या कहता है

योजना के संचालन आदेश के पैरा 2.2 में लाभार्थियों की पहचान की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से बताई गई है। इसके अनुसार पात्र परिवारों की पहचान के लिए

  • 2011 की सामाजिक-आर्थिक-जातीय जनगणना (SECC)
  • 2012 की मतदाता सूची
  • राशन कार्ड डाटाबेस का उपयोग किया जाना था।

दस्तावेज में यह भी उल्लेख है कि लाभार्थियों का डाटाबेस पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे, आधार और फोटो पहचान पत्र के आधार पर तैयार किया जाएगा, ताकि किसी भी प्रकार की दोहरी प्रविष्टि या गलत लाभ से बचा जा सके। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शासनादेश में कहीं भी राशन कार्ड को अनिवार्य शर्त नहीं बताया गया। आदेश में साफ शब्दों में कहा गया है कि पहचान के लिए मतदाता सूची या राशन कार्ड डाटाबेस दोनों का उपयोग किया जा सकता है।

दस्तावेजों से सामने आ रही तस्वीर

उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों में भी यही बात सामने आती है कि लाभार्थियों की पहचान कई स्रोतों के आधार पर की जानी थी। इसमें पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे और आधार जैसे दस्तावेजों का भी उल्लेख है। इसका उद्देश्य यह था कि कोई भी पात्र व्यक्ति केवल दस्तावेजों की कमी के कारण योजना से वंचित न रह जाए।

जमीनी स्तर पर अलग नियम

लेकिन यहीं से स्थिति उलझती दिखाई देती है। प्रदेश के कई जिलों से यह शिकायतें सामने आ रही हैं कि जिला आपूर्ति अधिकारी राशन कार्ड को अनिवार्य बताते हुए कई लाभार्थियों के कार्ड जारी नहीं कर रहे या उन्हें अमान्य घोषित कर रहे हैं।

यदि यह स्थिति सही है तो यह सीधे-सीधे सरकारी आदेश के विपरीत मानी जाएगी। क्योंकि आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पहचान के लिए राशन कार्ड या मतदाता सूची दोनों में से किसी का भी उपयोग किया जा सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ से प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होने लगे हैं—क्या किसी जिले का अधिकारी सरकारी आदेश से अलग नियम लागू कर सकता है?

इलाज की व्यापक व्यवस्था

योजना के तहत राज्य के अंदर और बाहर दोनों स्थानों पर इलाज की व्यवस्था की गई है। इसके लिए सरकारी और निजी अस्पतालों को पंजीकृत किया जाना है। राज्य के बाहर इलाज की स्थिति में भुगतान सीजीएचएस दरों के अनुसार किया जाएगा।

डायग्नोस्टिक सेंटर और औषधालयों को भी एनएबीएल और सीजीएचएस मानकों के आधार पर सूचीबद्ध किया जाना है। सामान्य परिस्थितियों में मरीज को सरकारी अस्पताल से रेफरल लेना होता है, लेकिन आपातकालीन स्थिति में सीधे उपचार की सुविधा भी दी गई है। आपातकालीन श्रेणी में 50 से अधिक गंभीर बीमारियों और स्थितियों को शामिल किया गया है। इनमें हार्ट अटैक, स्ट्रोक, एपेंडिसाइटिस, जलने की घटनाएं, जहर का प्रभाव और गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं शामिल हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को रेफरल का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

राष्ट्रीय पोर्टेबिलिटी और पहाड़ों के लिए विशेष लाभ

योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आयुष्मान भारत से जुड़े परिवारों को देशभर में इलाज की सुविधा मिलती है। योजना में कुल 1360 उपचार पैकेज शामिल हैं, जिनमें हृदय रोग, कैंसर, हड्डी रोग और अन्य गंभीर बीमारियों के उपचार शामिल हैं। पर्वतीय जिलों—जैसे अल्मोड़ा, चमोली और उत्तरकाशी—के लिए पैकेज दरों में 10 प्रतिशत अतिरिक्त भुगतान का प्रावधान भी किया गया है, ताकि दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को प्रोत्साहन मिल सके।

बजट और लाभार्थियों के आंकड़े

सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में लगभग 13.99 लाख राशन कार्ड हैं, जिनसे करीब 60 लाख से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। योजना के संचालन के लिए राज्य सरकार ने बजट में लगभग 600 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत ने भी यह कहा है कि सरकार ज्यादा से ज्यादा लोगों को योजना का लाभ देने के लिए पात्रता की शर्तों को सरल बनाने पर विचार कर रही है।

सबसे बड़ा सवाल

लेकिन इन सभी प्रावधानों और दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल अभी भी अनुत्तरित है। यदि शासनादेश में राशन कार्ड को अनिवार्य नहीं बताया गया है, तो फिर जमीनी स्तर पर इसे अनिवार्य क्यों बताया जा रहा है? क्या यह केवल प्रशासनिक भ्रम है, या फिर नियमों में वास्तव में कोई बदलाव किया गया है जिसका स्पष्ट आदेश अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ?

यही वह सवाल है जो आज अटल आयुष्मान योजना की विश्वसनीयता के सामने खड़ा है। क्योंकि यदि सरकारी आदेश और जमीनी व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर रहेगा, तो सबसे अधिक परेशानी उसी आम नागरिक को होगी जिसके लिए यह पूरी योजना शुरू की गई थी।

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