संरक्षण और खेती पर जोर, किसानों को किया गया सम्मानित
हमारी पंचायत, सोलन
हिमाचल प्रदेश में विलुप्त हो रहे औषधीय एवं सुगंधित पौधों के संरक्षण और संवर्धन को लेकर डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में एक दिवसीय इंटरएक्टिव कार्यशाला आयोजित की गई। राज्य वन विभाग के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, शोधार्थियों, वन अधिकारियों और प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन बल प्रमुख एवं जाइका वानिकी परियोजना के मुख्य परियोजना निदेशक डॉ. संजय सूद ने औषधीय पौधों की खेती की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण इनके प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं, ऐसे में संरक्षण और वैज्ञानिक खेती की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा कि औषधीय पौधे किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने अंतराफसलीकरण, प्राकृतिक खेती और गुणवत्ता आधारित उत्पादन पर जोर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत वानिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. सी.एल. ठाकुर के स्वागत भाषण से हुई। वन उत्पाद विभाग के प्रमुख डॉ. यशपाल शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय 32 औषधीय एवं सुगंधित पौधों पर कार्य कर रहा है और कई प्रजातियों की कृषि तकनीक का मानकीकरण किया जा चुका है।
तकनीकी सत्र में हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट के डॉ. संदीप शर्मा, जाइका परियोजना के डॉ. राजेश चौहान तथा पूर्व प्रोफेसर डॉ. रविंदर रैना ने अपने विचार साझा किए और औषधीय पौधों के संरक्षण एवं भविष्य की रूपरेखा पर चर्चा की।
इस अवसर पर वन विभाग के आईडीपी प्रोजेक्ट के तहत वन संसाधन एवं पर्यावरण उद्यमिता केंद्र का उद्घाटन किया गया तथा किसानों को चिरायता और कलिहारी के पौधे वितरित किए गए।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के वैधानिक अधिकारी डॉ. एच.पी. संख्यान, डॉ. दौलत राम भारद्वाज, वन संरक्षक सोलन नरेंद्र प्रकाश भरोट, जाइका वानिकी परियोजना के परियोजना निदेशक श्रेष्ठा नंद शर्मा, डीएफओ सोलन सहित अन्य वैज्ञानिक, वन अधिकारी और किसान उपस्थित रहे।
इस दौरान पांच प्रगतिशील किसानों—पवन कुमार (चंबा), ओम प्रकाश (कांगड़ा), राजेश कुमार कंवर एवं हरदेश बत्रा (सिरमौर) तथा कृपाल सिंह (शिमला)—को औषधीय पौधों की खेती में योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

