सेब बागवानी में घटता परागण, किराये की मधुमक्खियां बनी मजबूरी

सेब बागवानी में घटता परागण, किराये की मधुमक्खियां बनी मजबूरी

हमारी पंचायत, देहरादून

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सेब पट्टियों में इन दिनों परागण को लेकर एक नया संकट गहराता नजर आ रहा है। कभी बागानों में स्वाभाविक रूप से दिखने वाली मधुमक्खियां अब तेजी से कम हो रही हैं, जिससे फल उत्पादन प्रभावित होने लगा है। विशेषज्ञों के अनुसार, सेब सहित पहाड़ी फलों में लगभग 70 से 80 प्रतिशत परागण मधुमक्खियों के माध्यम से होता है, ऐसे में इनकी कमी सीधे तौर पर उत्पादन में गिरावट का कारण बन रही है

हिमाचल के शिमला, कुल्लू और किन्नौर जैसे बड़े सेब उत्पादक क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तराखंड के उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा के ऊंचाई वाले इलाकों में भी यही स्थिति सामने आ रही है। बागवानों का कहना है कि पहले फूल खिलते ही मधुमक्खियां स्वतः बागानों में पहुंच जाती थीं, लेकिन अब उनकी संख्या में लगातार गिरावट देखी जा रही है।

इस कमी को पूरा करने के लिए किसानों को अब मैदानी इलाकों से मधुमक्खियों के बॉक्स किराये पर मंगवाने पड़ रहे हैं। एक सीजन में एक बॉक्स का किराया 1500 से 3000 रुपये तक पहुंच गया है, जिससे बागवानी की लागत बढ़ती जा रही है। हालांकि, ये बाहरी मधुमक्खियां भी पूरी तरह प्रभावी साबित नहीं हो पा रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, मैदानी क्षेत्रों में पली मधुमक्खियां पहाड़ों की ठंडी जलवायु, ऊंचाई और तेज हवाओं के साथ आसानी से सामंजस्य नहीं बैठा पातीं। कई बार ये मधुमक्खियां नए वातावरण में दिशा भ्रम का शिकार होकर छत्ते तक वापस नहीं लौट पातीं, जिससे कॉलोनियां कमजोर पड़ जाती हैं और परागण अधूरा रह जाता है।

इधर, ओलावृष्टि से फसलों को बचाने के लिए बागानों में लगाए जा रहे एंटी-हेल नेट (जाल) ने भी नई चिंता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि घने जाल मधुमक्खियों की आवाजाही में बाधा बनते हैं। कई मामलों में मधुमक्खियां जाल से टकराकर वापस लौट जाती हैं या बागानों के भीतर पर्याप्त संख्या में प्रवेश नहीं कर पातीं, जिससे परागण प्रभावित होता है। कुछ मामलों में तो मधुमक्खियां जाल में फंसकर मर भी जाती हैं, जिससे कॉलोनियों को अतिरिक्त नुकसान होता है।

परागण में कमी का असर सीधे फसल पर दिख रहा है। जिन पेड़ों में पर्याप्त परागण नहीं हो पाता, उनमें या तो फल बनते ही नहीं हैं या फिर फल छोटे, कमजोर और असमान आकार के रह जाते हैं। बागवानों के अनुसार, जिन हिस्सों में मधुमक्खियों की गतिविधि कम रही, वहां फल की संख्या में साफ गिरावट देखी गई है। कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि खराब परागण के कारण उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी आ सकती है, जिससे किसानों की आय प्रभावित हो रही है।

इस बीच बागानों में परागण के लिए विदेशी मधुमक्खी एपिस मेलिफेरा की मांग तेजी से बढ़ी है। इसे स्थानीय पहाड़ी मधुमक्खियों की तुलना में अधिक सक्रिय और फुर्तीला माना जाता है। जहां पहाड़ी मधुमक्खी एक फूल पर जाने में 2 से 3 मिनट लेती है, वहीं एपिस मेलिफेरा एक मिनट में 25 से 30 फूलों तक पहुंच सकती है, जिससे परागण की प्रक्रिया तेज होती है। इसी कारण बागवान अब इसे प्राथमिकता दे रहे हैं। विभाग की ओर से एक महीने के लिए एक बॉक्स का किराया करीब 1600 रुपये निर्धारित किया गया है, जबकि मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए 50 पेटियों तक पर 80 प्रतिशत सब्सिडी भी दी जा रही है।

विभागीय आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में लगभग 1.20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सेब की खेती हो रही है, जहां परागण के लिए प्रति हेक्टेयर चार बॉक्स की आवश्यकता होती है। हर साल करीब पांच लाख बॉक्स की मांग रहती है, लेकिन उपलब्धता करीब 1.50 लाख बॉक्स तक ही सीमित है। ऐसे में बागवानों की केवल 20 से 30 प्रतिशत जरूरत ही पूरी हो पा रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सेब के बगीचों में 5 से 10 प्रतिशत फूल आने के बाद ही मधुमक्खियों के बॉक्स रखने चाहिए, ताकि परागण अधिक प्रभावी हो सके। साथ ही मधुमक्खियां उन्हीं क्षेत्रों में अधिक सक्रिय होती हैं जहां फूलों की संख्या ज्यादा होती है, ऐसे में बागानों का संतुलित प्रबंधन भी जरूरी हो गया है।

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