उत्तराखंड में 300 जलस्रोतों पर संकट

उत्तराखंड में 300 जलस्रोतों पर संकट

सूखते नौले-धारों के पुनर्जीवन को ग्राम और वन पंचायतों की भागीदारी बढ़ाएगी सरकार

हमारी पंचायत, देहरादून

गंगा और यमुना जैसी सदानीरा नदियों के उद्गम स्थल माने जाने वाले उत्तराखंड में भी पेयजल संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं, जिससे गांवों में पानी की समस्या बढ़ती जा रही है। इस चुनौती से निपटने के लिए राज्य सरकार अब ग्राम पंचायतों और वन पंचायतों को जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन की जिम्मेदारी सौंपने जा रही है।

राज्य सरकार पहले से ही स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथॉरिटी (सारा) के माध्यम से प्राकृतिक जलधाराओं और नदियों के पुनर्जीवन पर काम कर रही है। अब इस अभियान को गांव स्तर तक मजबूत करने की तैयारी की गई है। इसके तहत गांवों के आसपास स्थित नौले, धार, प्राकृतिक स्रोत और छोटी जलधाराओं के संरक्षण एवं जीर्णोद्धार में पंचायतों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।

शासन ने राज्य की 7,817 ग्राम पंचायतों और 11,217 वन पंचायतों से उनके क्षेत्रों में मौजूद जलस्रोतों का विस्तृत ब्यौरा मांगा है। पंचायतों को यह जानकारी देनी होगी कि कितने जलस्रोत अभी सक्रिय हैं, कितने सूख चुके हैं और किन स्रोतों में जलस्तर तेजी से घट रहा है। इस आधार पर सरकार व्यापक कार्ययोजना तैयार करेगी।

पूर्व में नीति आयोग की रिपोर्ट में भी चेतावनी दी गई थी कि उत्तराखंड में करीब 300 प्राकृतिक जलस्रोत और नदियां या तो पूरी तरह सूख चुकी हैं या फिर समाप्त होने की कगार पर हैं। जो जलधाराएं कभी पूरे वर्ष बहती थीं, वे अब केवल बरसात के मौसम तक सीमित होती जा रही हैं। रिपोर्ट में पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई थी।

उधर, उत्तराखंड जल संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार राज्य की लगभग 500 पेयजल योजनाओं के स्रोतों में पानी का स्तर 10 से 90 प्रतिशत तक घट चुका है। इससे कई इलाकों में गर्मियों के दौरान पेयजल संकट और गहरा गया है।

पंचायती राज विभाग के विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार सभी जिला पंचायती राज अधिकारियों को जलस्रोतों से जुड़ा पूरा विवरण एकत्र करने के निर्देश दिए गए हैं। वन पंचायतों से भी इसी प्रकार की जानकारी मांगी गई है। सरकार का लक्ष्य पंचायतों की मदद से गांव स्तर पर जल संरक्षण और जलस्रोतों के पुनर्जीवन को जनभागीदारी का अभियान बनाना है।

जल संरक्षण और जीर्णोद्धार से जुड़े कार्यों के लिए केंद्र एवं राज्य वित्त आयोग से मिलने वाले अनुदान का उपयोग किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर शासन स्तर से अतिरिक्त धनराशि भी उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि गांवों में जल संरक्षण के कार्य प्रभावी ढंग से पूरे हो सकें।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *