धराली त्रासदी, मलवे में उम्मीद की गूंज

धराली त्रासदी, मलवे में उम्मीद की गूंज

एक महीना बीतने के बाद भी सीएम धामी से ज़िंदा है उम्मीद

हमारी पंचायत, देहरादून

धराली की त्रासदी को एक महीने से ज्यादा वक्त हो गया है। पहाड़ों के बीच बसा यह छोटा-सा गांव अब भी मलबे और खंडहरों के बीच सांस ले रहा है। टूटी सड़कें, बह चुके गेस्ट हाउस और उजड़ चुके सेब के बगीचे इस बात के गवाह हैं कि आपदा ने धराली की पीढ़ियों की मेहनत पलभर में छीन ली।

लेकिन इस बर्बादी के बीच गांव की आंखों में अभी भी एक चमक है—उम्मीद की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आश्वासन और संवेदनशील व्यवहार ने लोगों को यह भरोसा दिया है कि चाहे रास्ता कितना ही कठिन क्यों न हो, धराली फिर से खड़ा होगा।

धराली की तबाही

गांव के 38 परिवार पूरी तरह उजड़ गए। 112 परिवारों का घर, जमीन और जीवनभर की कमाई मलबे में दफन हो गई। दर्जनों गेस्ट हाउस बह गए, सैकड़ों सेब के पेड़ उखड़ गए। पुल और सड़कें टूट गईं। धराली, जो कभी पर्यटकों का पसंदीदा ठिकाना था, आज खामोशी और बर्बादी का प्रतीक बन चुका है।

उमेश पवार की दास्तान

धराली के ही निवासी उमेश पवार उन परिवारों में से हैं, जिनकी पीढ़ियों की कमाई आपदा में बह गई। उनके पिता ने कठिन परिश्रम से सेब का बगीचा खड़ा किया था और गांव में उनका एक 12 कमरे का पुश्तैनी मकान था। उमेश ने उस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गांव में एक  गेस्ट हाउस बनाया था जिसमें 30 लाख से अधिक खर्च आया था। उम्मीद यही थी कि बाहर से आने वाले पर्यटक यहां की खूबसूरती का आनंद लेंगे और परिवार की आमदनी भी बढ़ेगी।

उमेश बताते हैं—

“ हमारा पुश्तैनी घर और गेस्ट हाउस केवल हमारी आय का साधन नहीं था, वह हमारी तीन पीढियां की मेहनत और सपनों की इमारत थी। हमने एक-एक ईंट जोड़कर उसे खड़ा किया था। हमें लगता था कि इसी से हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा।”

लेकिन आपदा के एक झौंके ने सबकुछ बदल दिया। उमेश 5 अगस्त को किसी काम से देहरादून गए थे। दिन जब मीडिया और सोशल मीडिया में धराली की जानकारी मिली तो ऐसा लगा कि पैरों तले जमीन खिसक गई। मां और पत्नी को लेकर अजीब खयाल आने लगे। कुछ देर बेसुध होने के बाद मोबाइल पर फोन आया और पत्नी से बात हुई ।

वो लगातार तो रही थी, सिर्फ इतना ही बोल पाई कि सब खत्म हो गया, मां जी किसी परिचित के घर पुरानी धराली में है और हमें रेस्क्यू करके आर्मी कैम्पलाया गया है।उनकी 72 वर्षीय मां ओर पत्नी ने अपनी आंखों से देखा कि कैसे उनका घर, गेस्ट हाउस मलबे में समा गया और सेब का पूरा बाग तेज़ बहाव में बह गया।

उमेश बताते हैं—

“पहले तो हमें लगा कि अब जिंदगी खत्म हो गई है। घर, बगीचा, गेस्ट हाउस—सब चला गया। हमारे पास बचाने लायक कुछ भी नहीं था। बस जान बच गई।”

उनकी आवाज़ रुक जाती है, लेकिन कुछ देर बाद वे जोड़ते हैं—

“उस वक्त हमें यह डर भी था कि शायद हमारी बात कोई नहीं सुनेगा। लेकिन जब मुख्यमंत्री गांव आए, तो लगा कि हमारे जख्मों को कोई देख रहा है, कोई समझ रहा है।”

मुख्यमंत्री का संवेदनशील चेहरा

आपदा के कुछ ही दिनों बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी धराली पहुंचे। गांव की टूटी सड़कों और खामोश गलियों से होते हुए जब वे प्रभावित परिवारों से मिले, तो वहां मौजूद हर शख्स ने एक अनोखा दृश्य देखा। ग्रामीणों का कहना है कि मुख्यमंत्री की आंखों में सचमुच आंसू छलक आए थे। वे हर परिवार से मिलें और कहा, —“जो खो गया है, वह लौट नहीं सकता, लेकिन आपकी जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की पूरी कोशिश की जाएगी। यह मेरी जिम्मेदारी है और मैं पीछे नहीं हटूंगा।”

मुख्यमंत्री ने 105 परिवारों को पाँच-पाँच लाख रुपये की राहत राशि सौंपी। लेकिन यहां केवल चेक बांटना ही मुख्य बात नहीं थी। उनके शब्द, उनकी आंखों की नमी और लोगों का हाथ थामने का तरीका धराली के ग्रामीणों को हिम्मत दे गया।

आज जब नेताओं पर संवेदनहीन होने के आरोप लगते हैं, धामी का यह रूप अलग दिखा। उनका व्यवहार धराली के लोगों के लिए उम्मीद की लौ बन गया। उमेश पवार कहते हैं कि मुख्यमंत्री का गांव आना उनके लिए केवल आर्थिक राहत नहीं था, बल्कि टूटी हुई आत्मा को सहारा देने जैसा था।

“मुख्यमंत्री ने जब हमारा हाथ पकड़कर कहा कि ‘जो खो गया है, वह लौट नहीं सकता, लेकिन आपकी जिंदगी को पटरी पर लाना मेरी जिम्मेदारी है,’ तो हमें लगा कि यह केवल एक नेता नहीं, बल्कि परिवार का अपना मुखिया हमारे सामने खड़ा है। उनकी आंखों में आंसू देखकर लगा कि हमारे दर्द को उन्होंने सचमुच महसूस किया है।”

उमेश आगे कहते हैं—

“हम गरीब लोग शब्दों में अपनी तकलीफ बयां करने में अक्सर असमर्थ हो जाते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री ने हमारी आंखों में झांककर ही हमारी हालत पढ़ ली। हमें कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यह संवेदनशीलता हमारे लिए सबसे बड़ी राहत है।”

उनके मुताबिक, पाँच लाख की राहत राशि अपने आप में मदद है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा अहम मुख्यमंत्री का व्यवहार और उनके शब्द थे।

“पैसा तो कहीं से भी आ सकता है, लेकिन दिलासा सिर्फ कोई अपना देता है। मुख्यमंत्री ने हमें यह एहसास दिलाया कि हम अकेले नहीं हैं। यही भरोसा हमें आगे बढ़ने की ताकत देगा।”

उमेश जैसे कई परिवार मानते हैं कि आपदा ने उनकी पीढ़ियों की मेहनत छीन ली, लेकिन मुख्यमंत्री की मौजूदगी ने उनके दिलों में यह विश्वास जगाया कि धराली एक दिन फिर से उठ खड़ा होगा।

राज्यपाल का आकलन

प्रदेश के राज्यपाल भी आपदा प्रभावितों से मिलने पहुंचे। उन्होंने कहा— “मैं जब पहले आया था तो यहां मंदिर में मैंने पूजा अर्चना की और गांव का भ्रमण किया था, लेकिन आज मंदिर सहित पूरा धराली डूब गया है। धराली में हुई तबाही का कोई आर्थिक आकलन संभव नहीं है। यहां 900 करोड़ नहीं, 9000 करोड़ भी कम होंगे, क्योंकि यह तीन पीढ़ियों की मेहनत है।”

यह बयान उस दर्द को उजागर करता है, जिसे पैसे से कभी नहीं मापा जा सकता। गांव के बुजुर्गों ने इसे सुनकर सिर हिलाया और कहा कि सचमुच यह तबाही केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि पीढ़ियों की मेहनत और सपनों का विनाश है।

धराली की चुनौतियां

आपदा के बाद से धराली राहत सामग्री पर टिका हुआ है। जगह-जगह से भोजन, कपड़े और अन्य सहायता पहुंच रही है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि उनकी असली जरूरत नकद आर्थिक मदद की है, ताकि वे दोबारा अपने घर और बगीचे खड़े कर सकें।

गांव अब न गलियां नज़र आती हैं और न मकान का मंजर है। कभी गूंजते मेहमानखानों की जगह अब खामोशी है। बच्चे स्कूल जाने के बजाय अपने माता-पिता के साथ मलबा हटाने में लगे हैं। महिलाएं घर के टूटे बर्तनों और बची-खुची चीजों को संभाल रही हैं।

उम्मीद की किरण

हालांकि त्रासदी ने धराली की पीढ़ियों की कमाई छीन ली, लेकिन मुख्यमंत्री धामी की मौजूदगी ने एक विश्वास जगाया है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अपनी पीड़ा बार-बार कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी। मुख्यमंत्री ने उनकी आंखों में झांककर ही तकलीफ समझ ली।

धराली की खामोशी आज भी टूटी नहीं है। लेकिन इस खामोशी में एक गूंज है—संवेदनशील नेतृत्व की। यह गूंज गांव के हर दिल को यह यकीन दिला रही है कि एक दिन धराली फिर से उठ खड़ा होगा।

मानवीय राजनीति का संदेश

धराली की त्रासदी ने एक बार फिर दिखा दिया कि प्राकृतिक आपदाओं के सामने मनुष्य कितना असहाय हो जाता है। लेकिन इस आपदा में एक और बात स्पष्ट हुई—नेतृत्व केवल सत्ता का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि लोगों के दुख में उनके साथ खड़ा होना भी है।

मुख्यमंत्री धामी ने जो किया, वह राजनीति से ऊपर जाकर मानवीय संवेदना का उदाहरण है। यही कारण है कि धराली के लोग आज भी उनकी आंखों में छलकते आंसुओं और सधे हुए शब्दों को याद करते हैं।

धराली आज भी मलबे में दबी हुई कहानियों और टूटी उम्मीदों का गांव है। लेकिन उमेश पवार जैसे लोग बताते हैं कि जब संवेदनशील नेतृत्व पीड़ा को अपना समझकर गांव में आता है, तो टूटे हुए दिलों में भी नई किरण जग जाती है।

यह संदेश धराली की त्रासदी के साथ-साथ उस उम्मीद का भी चित्रण है, जिसे मुख्यमंत्री धामी ने अपने व्यवहार और शब्दों से जन्म दिया। धराली के लोग जानते हैं कि उनकी पीढ़ियों की कमाई लौटकर नहीं आएगी, लेकिन यह भी सच है कि अगर संवेदनशील हाथ उनके साथ हैं, तो वे दोबारा खड़े हो सकते हैं। धराली की खामोशी में गूंजती यही उम्मीद भविष्य के लिए संबल है।

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