हर मरीज की अनिवार्य रिपोर्टिंग से शुरुआती पहचान और रोकथाम पर जोर
हमारी पंचायत, देहरादून
उत्तराखंड सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए कुष्ठ रोग (लेप्रोसी) को अनिवार्य सूचना योग्य बीमारी घोषित कर दिया है। अब राज्य में कार्यरत सभी सरकारी और निजी चिकित्सकों, अस्पतालों तथा पैथोलॉजी केंद्रों को कुष्ठ रोग के प्रत्येक संदिग्ध और पुष्ट मामले की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को देना अनिवार्य होगा। इस निर्णय का उद्देश्य रोग की शुरुआती पहचान, समय पर उपचार और संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ना है, ताकि रोग उन्मूलन लक्ष्य की दिशा में प्रगति तेज हो सके।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार कुष्ठ रोग अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि छिटपुट रूप से नए मामले सामने आते रहते हैं। समस्या यह रही कि निजी क्षेत्र में उपचार लेने वाले कई मरीज सरकारी निगरानी प्रणाली में दर्ज ही नहीं हो पाते थे। इससे वास्तविक रोग भार का आकलन कठिन हो जाता था और संपर्क ट्रेसिंग व रोकथाम उपाय प्रभावी नहीं हो पाते थे। अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू होने से अब सभी मामलों का केंद्रीकृत पंजीकरण संभव होगा।
राष्ट्रीय स्तर पर भारत ने 2005 में कुष्ठ रोग उन्मूलन (प्रति 10 हजार आबादी पर 1 से कम प्रसार दर) का लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की थी, लेकिन इसके बाद भी हर वर्ष नए मामले सामने आते रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार देश में प्रति वर्ष लगभग 1.1–1.3 लाख नए कुष्ठ रोगी दर्ज होते हैं, जिनमें से 3–5 प्रतिशत बच्चे होते हैं—जो सक्रिय संक्रमण की निरंतरता का संकेत है। उत्तराखंड जैसे अपेक्षाकृत कम बोझ वाले राज्य में भी हर वर्ष सैकड़ों नए मरीज सामने आते हैं, जिनमें कुछ विकलांगता-ग्रस्त अवस्था में ही पहचान में आते हैं। यह देर से निदान का संकेत है।
अनिवार्य सूचना योग्य घोषित करने का सीधा लाभ यह होगा कि रोगी की पहचान होते ही उसका उपचार, परिवार व निकट संपर्कों की जांच और निवारक दवा वितरण समय पर किया जा सकेगा। कुष्ठ रोग का इलाज पूरी तरह संभव है और बहु-औषधि चिकित्सा (MDT) सरकारी संस्थानों में निःशुल्क उपलब्ध है। यदि रोग की पहचान शुरुआती अवस्था में हो जाए तो स्थायी विकलांगता, नसों की क्षति और सामाजिक कलंक से बचाव संभव है।
राज्य में स्वास्थ्य विभाग ने जिला स्तर पर कुष्ठ नियंत्रण इकाइयों को सक्रिय करने, आशा व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को संदिग्ध लक्षण पहचानने का प्रशिक्षण देने और सामुदायिक स्क्रीनिंग अभियान चलाने की योजना बनाई है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा जहां पूर्व में अधिक मामले दर्ज हुए हैं या प्रवासी आबादी का आवागमन अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बिखरी बसावट और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण कई मामले देर से सामने आते हैं, इसलिए घर-घर संपर्क आधारित खोज अभियान प्रभावी हो सकते हैं।
कुष्ठ रोग के प्रति सामाजिक कलंक भी देर से उपचार का बड़ा कारण है। कई मरीज प्रारंभिक त्वचा धब्बों या सुन्नता जैसे लक्षणों को छिपाते रहते हैं और स्थानीय स्तर पर अपूर्ण या गलत उपचार लेते हैं। अनिवार्य रिपोर्टिंग से यह सुनिश्चित होगा कि निजी चिकित्सक भी रोगी को राष्ट्रीय कार्यक्रम से जोड़ें और मानकीकृत उपचार प्रोटोकॉल का पालन हो। इससे अधूरे उपचार या दवा प्रतिरोध के जोखिम भी कम होंगे।
स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों का मानना है कि रोग निगरानी की यह पहल तभी सफल होगी जब रिपोर्टिंग को सरल, डिजिटल और दंडात्मक के बजाय सहयोगात्मक बनाया जाए। ऑनलाइन पोर्टल या मोबाइल ऐप आधारित रिपोर्टिंग से निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी। साथ ही मरीज की गोपनीयता और गरिमा की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, ताकि लोग बिना भय के जांच और उपचार के लिए आगे आएं।
उत्तराखंड में कुष्ठ रोग को अनिवार्य सूचना योग्य घोषित करने का निर्णय संकेत देता है कि राज्य सरकार अब उन्मूलन के अंतिम चरण की चुनौतियों—छिपे मामलों की पहचान, समय पर उपचार और सामाजिक पुनर्वास—पर केंद्रित रणनीति अपनाना चाहती है। यदि रिपोर्टिंग, उपचार और सामुदायिक जागरूकता तीनों मोर्चों पर समन्वित प्रयास होते हैं, तो राज्य में कुष्ठ रोग के शेष बोझ को भी प्रभावी ढंग से समाप्त करने की दिशा में ठोस प्रगति संभव होगी।
