लेखक गांव: हिमालय की गोद में साहित्य का अद्भुत ठिकाना

लेखक गांव: हिमालय की गोद में साहित्य का अद्भुत ठिकाना

हमारी पंचायत, देहरादून

अक्सर साहित्य लेखन व रचनाधर्मिता के लिए कवि, साहित्यकार व विभिन्न रचनाकार शांत, वादियों व घाटियों को तलाशतें हैं ताकि वर्तमान की चकाचौंध से दूर शुकून के पलों में अपने लेखन में ईश्वरीय तत्वों का समावेश कर सकें। ऐसे ही एक स्थान की तलाश तब खत्म हो जाती है जब हम शहर की भागदौड़ से दूर, हरियाली और शांति के बीच लेखन और रचनात्मकता की दुनिया को राजधानी देहरादून के आस-पास ही तलाश लेते हैं। इस सबका जबाब है उत्तराखंड का लेखक गांव। देहरादून से मात्र 30 किलोमीटर दूर थानो क्षेत्र की घाटियों में बसा यह गांव सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि साहित्य, कला और संस्कृति का जीवंत केंद्र है।

“यहां आकर लगता है जैसे हर पत्थर, हर पेड़ और हर हवेली किसी कवि या लेखक की कहानी कह रही हो,” कहते हैं यहाँ आए लेखक और कवि रवि शर्मा।

स्थापना: विचार से वास्तविकता तक

लेखक गांव की नींव रखी थी पूर्व केंद्रीय मंत्री और साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने। उनका उद्देश्य था उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना और लेखकों के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार करना, जहाँ वे बिना किसी विघ्न के अपने विचार और रचनाएँ विकसित कर सकें।

यह स्थान केवल लेखन के लिए नहीं है; यह एक सांस्कृतिक हब है, जहां साहित्यिक विचारों का आदान-प्रदान होता है, कार्यशालाएँ आयोजित होती हैं और युवा लेखकों को मार्गदर्शन मिलता है।

सुविधाएँ: आराम और प्रेरणा का संगम

लेखक गांव में आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ रचनात्मक माहौल भी उपलब्ध है:

लेखक कुटीर: कवि और लेखकों के नाम पर बनाए गए कुटीर—कालिदास, कबीर, रवींद्रनाथ टैगोर, सुमित्रानंदन पंत—लेखकों को शांति और ध्यान का माहौल प्रदान करते हैं।

हिमालय रसोई: स्थानीय और जैविक खाद्य पदार्थों से बना स्वादिष्ट भोजन।

नालंदा पुस्तकालय: साहित्य, इतिहास, राजनीति, धर्म, दर्शन और भूगोल से संबंधित हजारों पुस्तकें।

राहुल सांकृत्यायन भवन: शोधकर्ताओं और लेखकों के लिए आरामदायक अतिथि गृह।

स्पर्श हिमालय कुटीर: प्राकृतिक आवास अनुभव देने वाले टेंटेड कॉटेज।

रम्माण भवन: 350 सीटों वाला ऑडिटोरियम साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए।

गतिविधियाँ: रचनात्मकता का उत्सव

लेखक गांव का मुख्य आकर्षण इसके साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम हैं।

लेखन कार्यशालाएँ और रेज़ीडेंसी प्रोग्राम: लेखक और कवि अपनी कला में निखार ला सकते हैं।

स्पर्श हिमालय महोत्सव: 65 देशों के 300 से अधिक लेखक, कलाकार और साहित्यकार इसमें भाग लेते हैं। महोत्सव में साहित्यिक चर्चाएँ, कला प्रदर्शनियाँ, संगीत और नाट्य प्रस्तुतियाँ आयोजित होती हैं।

आगंतुक अनुभव: शांति और प्रेरणा

लेखक गांव में मुख्य रूप से लेखक, कवि, शोधकर्ता और साहित्य प्रेमी आते हैं। यहाँ का वातावरण मानसिक शांति और रचनात्मक ऊर्जा दोनों प्रदान करता है।

आगंतुक कहते हैं:

“यहाँ की हर सुबह, घाटियों की ठंडी हवा, और पुस्तकालय की शांति मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती है।” – एस पी शर्मा, पत्रकार/ लेखक

पर्यटक यहाँ न केवल साहित्यिक गतिविधियों का आनंद लेते हैं, बल्कि हिमालय की गोद में समय बिताने का अद्भुत अनुभव भी पाते हैं।

पहुंचने के साधन:

वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा – जॉली ग्रांट, देहरादून (लगभग 20 से 30 किलोमीटर)।

रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन – देहरादून (लगभग 30 किलोमीटर)।

सड़क मार्ग: टैक्सी, निजी वाहन या बस द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।

ठहरने और कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए शुल्क और विवरण स्पर्श हिमालय फाउंडेशन से संपर्क करके प्राप्त किया जा सकता है।

साहित्य और प्रकृति का अद्वितीय संगम

लेखक गांव केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रेरणा का स्रोत है। यहाँ का हर कोना, हर कुटीर और हर कार्यक्रम रचनात्मकता को प्रोत्साहित करता है।

यदि आप लेखन, रचनात्मकता और आत्म-चिंतन के लिए समय निकालना चाहते हैं, तो यह स्थान आपके लिए आदर्श है। उत्तराखंड केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति के लिए भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

ज्ञात हो उत्तराखंड का लेखक गाँव (Writers’ Village) देश का पहला हिमालयी लेखक गाँव है, जो साहित्यकारों, कवियों और रचनाकारों के लिए एक आदर्श सृजनात्मक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।

यह गाँव उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के निकट थानो में स्थित है, जो हिमालय की तलहटी में बसा एक शांत और सुरम्य क्षेत्र है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक समृद्धि लेखकों को चिंतन-मनन और रचना के लिए प्रेरित करती है।

 इस गाँव की अवधारणा पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की है, जो स्वयं एक प्रमुख साहित्यकार हैं। इसका विचार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा है। डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ लेखक गाँव की परिकल्पना को लेकर बताते हैं कि एक पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान वाजपेयी जी ने लेखकों की कठिनाइयों पर भावुक होकर आंसू बहाए थे और कहा था कि देश में लेखकों के लिए एक विशेष स्थान होना चाहिए।

इसी प्रेरणा को दृढ़ संकल्प के रूप में लेकर उन्होंने एक परिकल्पना को साकार रूप देकर सम्पूर्ण मनोयोग से ‘लेखक गाँव’ की स्थापना की ताकि वह एक दुर्लभ कर्मयोगी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी की पीड़ा से पनपी साहित्यिक फसल को हरित रूप दे सकें।

डॉ ‘निशंक’ कहते हैं कि उनका लक्ष्य ‘लेखक गाँव’ के पुस्तकालय में दुनिया भर की कम से कम 10 लाख पुस्तकों का संग्रह करने का है। उनकी परिकल्पना नये नालंदा को जीवन्त करने जैसी है। वह दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ इस कार्य पर लगे हुए हैं।

ज्ञात हो कि 25-27 अक्टूबर 2024 को स्पर्श हिमालय फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित स्पर्श हिमालय महोत्सव-2024 के दौरान इसका लोकार्पण किया गया। उद्घाटन समारोह में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अन्य प्रमुख हस्तियाँ उपस्थित रहीं। इस महोत्सव में 65 देशों से 300 से अधिक लेखक, कलाकार और साहित्यकारों ने भाग लिया था।

लेखक गाँव 50 बीघा क्षेत्र में फैला है, जहाँ लेखकों को प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान के साक्षात्कार का अवसर मिलेगा। मुख्य सुविधाएँ निम्नलिखित हैं:लेखक कुटीर: फिलहाल 12 कुटीर बनाए गए हैं, जहाँ लेखक निवास कर सृजन कर सकेंगे। भविष्य में और बढ़ाए जाएँगे।

संजीवनी वाटिका, नक्षत्र और नवग्रह वाटिका: औषधीय पौधों और खगोलीय थीम पर आधारित उद्यान।

पुस्तकालय और कला दीर्घा: साहित्यिक और कलात्मक संग्रह के लिए।

योग-ध्यान केंद्र और परिचर्चा केंद्र: चिंतन और चर्चा के लिए।

गंगा-हिमालय संग्रहालय: स्थानीय संस्कृति और इतिहास का प्रदर्शन।

यह गाँव लेखकों की आर्थिक, सामाजिक और रचनात्मक चुनौतियों का समाधान करने की दिशा में एक अभिनव पहल है, जहाँ वे विविध विषयों पर नए दृष्टिकोण प्राप्त कर सकेंगे।

 यह उत्तराखंड की सृजनशीलता का प्रतीक है और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा। हिंदी और स्थानीय भाषाओं पर विशेष जोर होगा।

भविष्य की योजनाएँ: निर्माण का पहला चरण पूरा हो चुका है; अगला चरण चल रहा है। यह ‘लेखकों का तीर्थ’ बनेगा, जहाँ युवा रचनाकारों को मंच मिलेगा।

बहरहाल अभी प्रारंभिक अवस्था में होने के कारण, इसकी परिकल्पना के मानक पूर्ण करने के लिए डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ऐड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। एक बड़ी टीम लेखक गाँव को उसकी बुलंदियों तक पहुँचाने में अपना योगदान दे रही है। यह कहा जा सकता है कि आने वाले कुछ बर्षों में ‘लेखक गाँव’ साहित्य सृजना व वैज्ञानिक दृष्टि से न सिर्फ भारत बर्ष का अपितु सम्पूर्ण विश्व भर का नालंदा विश्वविद्यालय जैसा बिशाल बन सकता है।

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