हमारी पंचायत
राजीव गाँधी के समय में संविधान संशोधन का प्रस्ताव आया तो उसमें भी ग्राम सभा की बात नहीं थी। बाद में ग्राम सभाएं आई। अनुच्छेद 273 में लिखा गया कि “ग्राम सभाओं को राज्य का विधनमण्डल वह अधिकार देगा जिससे कि वो स्वायत्त शासन की इकाई के रूप में काम कर सके”।
यहां पर भी वही बात है कि विधानमण्डल ही ताकत देगा कि ग्राम सभाओं को ताकत दी जाए या नहीं। हमारी जो व्यवस्था है वो इस भ्रम है कि वो ग्राम सभाओं को ताकत देगा। ग्राम सभाएं सिर्फ सिफारिश कर सकती हैं और उस पर काम हो या न हो ये ग्राम पंचायत तय करेंगी।
ग्राम सभाओं को कोई नहीं चाहता है। दिल्ली युनिवर्सिटी की प्रोफेसर मैनन जैन ने एक कविता लिख डाली कि “मुझे कोई नहीं चाहता, मुख्यमंत्री नहीं चाहता, मंत्री नहीं चाहता, कमिश्नर नहीं चाहता और तो और मेरा खुद सरपंच नहीं चाहता”।
ग्राम सभाओं को इसलिए कोई नहीं चाहता कि उसमें झूठ नहीं चल सकता। गांव में एक न एक ऐसा बावला जरूर होगा जो कि पिटता जाएगा और कहता जाएगा कि मैं तो सच बोलूंगा। उसको चाहे कितने जूते लगाओ पर वो तो सच ही बोलेगा। इसीलिए कोई बड़ा राजनीतिज्ञ ग्राम सभाओं को नहीं चाहता।
हमने कुछ गांवों में लोगों से सवाल पूछा कि यदि दिल्ली खत्म हो जाए, चण्डीगढ़ खत्म हो जाये तो क्या गांव चलेगा? जवाब मिला कि चलेगा। हमने पूछा कि चलेगा कि दौड़ेगा। तो लोगों ने माना कि दौड़ेगा। गांव-समाज राज्य की स्थापना के पहले से था। यह मानना कि राज्यों के बिना ग्राम सभाएं नहीं चलेगी यह लोकतान्त्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।

ग्राम पंचायत राज्य द्वारा बनाई गई है, मान लीजिए चुनाव न हो या पंचायत राज कानून ख़त्म हो जाता है तो भी ग्राम सभाएं तो रहेंगी ही। निस्संदेह लोकतन्त्र की पहली सीढ़ी ग्राम सभाएं ही है।
इसीलिए हमारा नारा है-:
“लोकसभा न विधान सभा, सबसे ऊंची ग्राम सभा”

