शहरी विकास से पंचायतों तक—नई जिम्मेदारी में तेजी से बदलाव की उम्मीद
हमारी पंचायत, देहरादून
देहरादून। मदन कौशिक को धामी सरकार में पंचायतीराज विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। त्रिवेंद्र सरकार में शहरी विकास मंत्री रहे कौशिक को अब गांवों की सरकार को मजबूत करने की अहम भूमिका निभानी होगी। इस बदलाव के साथ ही उनसे उम्मीदें भी काफी बढ़ गई हैं कि वे पंचायतों को अधिक अधिकार दिलाकर विकास की रफ्तार तेज करेंगे।
राज्य में पंचायतों को सशक्त बनाने की राह आसान नहीं है। मंत्री के सामने कई ऐसी चुनौतियां हैं, जिनका समाधान कम समय में करना जरूरी होगा। सबसे बड़ी चुनौती पंचायतों को संविधान के तहत मिलने वाले 29 विषयों का पूर्ण हस्तांतरण है, जो राज्य गठन के 25 साल बाद भी अधूरा है। इससे पंचायतों को अभी तक पूरी वित्तीय और प्रशासनिक स्वतंत्रता नहीं मिल सकी है।
इसके अलावा प्रदेश की 850 से अधिक ग्राम पंचायतों के पास खुद का पंचायत भवन नहीं है, जिससे प्रशासनिक कार्यों में दिक्कत आती है। वहीं, पलायन भी बड़ी समस्या बन चुका है—राज्य की एक हजार से ज्यादा पंचायतें पूरी तरह खाली हो चुकी हैं, जहां लोगों की वापसी सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
पंचायत भवन निर्माण की योजनाएं भी अटकी हुई हैं। सरकार ने निर्माण लागत 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपये करने की घोषणा की थी, लेकिन कैबिनेट से मंजूरी न मिलने के कारण पिछले दो साल से इस मद का बजट खर्च नहीं हो पाया है।
इसके साथ ही शिक्षा विभाग के 2200 बंद हो चुके विद्यालयों को पंचायत भवन के रूप में उपयोग करने का प्रस्ताव भी अब तक लागू नहीं हो सका है। इन स्कूलों का पंचायतों को हस्तांतरण न होने से संसाधनों का बेहतर उपयोग भी नहीं हो पा रहा।
ऐसे में पंचायतीराज मंत्री के रूप में मदन कौशिक के सामने यह बड़ी परीक्षा होगी कि वे इन चुनौतियों को कैसे अवसर में बदलकर गांवों की छोटी सरकार को मजबूत बना पाते हैं।

