देहरादून घाटी का शहर

मैं देहरादून से बोल रहा हूँ…

देहरादून से अपना पुराना राब्ता है, तब दून एजुकेशन हब के अलावा बासमती, लीची, चाय के तलबगारों का पसंदीदा शगल था। विद्या औऱ ज्ञान के लिए दून की आबोहवा दुनिया मे अव्वल थी। सुदूर से तीमारदार मशहूर हकीमों से इलाज के लिए द्रौण नगरी का रुख करते, स्कूलों और अस्पताल में फीस कम थी भरोसा ज्यादा। शहर में मकान कम, खेत व दरखत ज्यादा नज़र आते थे। ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ लिए दोनों नदियों और चारों ओर पहाड़ से घिरी यह वादी सैलानियों के सकून का पसंदीदा गन्तव्य था। महान अशोक के अखंड भारत की साक्षी रही, गुरु द्रोण की नगरी, गढ़वाल और सिरमौर रियासतों का भी प्रतिअंग थी। गोरखा से गढ़वाल – ब्रिटानिया की जंग का मैदान के बाद सुगौली की सौदेबाजी में अंग्रेजों की हुकूमत का हिस्सा बन गयी। सिखों के सातवें गुरु हर राय के सबसे बड़े पुत्र सिद्ध महंत गुरु राम राय की संगत का डेरा पड़ने के बाद नदियों के संगम को विख्यात उत्तराखंड में फिर एक संयोग हुआ जिसमें बाबा के डेरा और गुरु द्रोंण के संगम से आज का देहरादून वज़ूद में आया जो आज लूट की सियासत का गढ़ हो गया है।


उत्तराखंड क्रांतिकारी एक पहाड़ी सूबे की अलख का अलाव लिए नयी सुबह को तनमयता से तराशने में मशगूल थे लेकिन उत्तरांचल के रूप में समय का पहिया पूरे सूबे में घूमा और देहरादून कील की तरह थिर देखता रहा। क्रांति के चराग और उसूलों की ओढ़नी लिय उत्तराखंडी नयी इमारत (गैरसैण) की इबादत में लगे रहे और दूसरी ओर उत्तरांचल की मशाल का हज़ूम उन्हें लांघ कर मेहमान खाने (देहरादून) में ही खूंटा गाड़ आया। फ़िर सजाने के ख़ाब दिखा कर दून की पीठ पर सारा बोझ ऐसा लदा कि नये शृंगार के नीचे देहरादून की सूरत और सीरत दोनों ज़मिदोज़ हो गई। लखनऊ के गोदाम में जंग खायी कारतूसें (नेता) देहरादून पहुंचते ही मोटार दागने लगी। कुछ घरों को रोशन करने की साजिश में सियासत ने विरासत की अनमोल धरोहर (टिहरी) डुबोकर पलायन रूपी दानव के लिए आखिर किवाड़ खोल ही दिया। फ़िर अशियाने की तलाश में उखड़ी आवाम पर गिद्ध दृष्टि गड़ाए अहले सियासत ने मयूरी दून के एक-एक पंख नोच डालने के लिए चौसर की बिसात सजा दी।
पहाड़ में जन्मा फिर भी दीवाना पहाड़ का, से उलट गाँव के लोग ‘पत्थर पलट कर’ (उस रास्ते पर दुबारा न जाने की कसम) अपने घरौंदे को सूना छोड़ देश और प्रदेश की राजधानी का रुख करने लगे। पलायन के प्रकोप ने कभी आँगन में बच्चों की अटखेलियों, बुग्यालों में मवेशियों के साथ डेरा डाले चरवाहे-ग्वाले, खेत – खलिहानों में गाती हाथ बंटाती औरतें, मंदिर – देवठियों में देवी देवताओं की पूजा में बजते ढ़ोल- नगाड़े, करनाले – रणसिंघे, हुड़की -दमाऊं और खंजरी की थाप पर थिरकते नटवे और बुज़ुर्गों के ठहाकों से गुलज़ार गांव को भूतिया गांव में तब्दील कर दिया। बाबा-दादा के खून – पीसीने और इजा-नानी के लाग-लगाव से बने घर-खेड़े, छत की आखरी स्लेट टूटने तक अपने नौनीहालों के लौटने की उमीद में आखिरी सांस ले रहे हैं।

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