लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण में 1 जून को देश के 8 राज्यों की 57 लोकसभा सीट पर चुनाव होगा। लेकिन सबसे अधिक निगाहें हिमाचल पर लगी हैं जहां 1 जून को लोकसभा की चार सीटों के अलावा विधानसभा की 6 सीटों के उपचुनाव के लिए भी वोटिंग होगी। यहाँ लोकसभा से ज्यादा विधानसभा के चुनाव ने लोगों को बैचैन किया है क्योंकि इन छः सीटों के परिणाम प्रदेश सरकार की सत्ता और परिवर्तन के परिणाम को तय करेंगे।
प्रधानमंत्री के 400 के लक्ष्य के लिए देश की एक-एक सीट बहुत मायने रखती है, इसलिए मोदी ने सिर्फ एक दिन प्रदेश में प्रचार किया और वो भी लोकसभा को देखते हुए शिमला और मंडी में चुनावी जनसभाएं की। ख़ास बात यह है कि इन दोनों जिला में विधानसभा उपचुनाव नहीं है। गौरतलब है कि विधानसभा के उपचुनाव हिमाचल के सत्ता और मुख्यमंत्री भी तय करेगी।
दिसंबर 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 40 सीटें मिली और बीजेपी के हिस्से 25 सीट आई, शेष तीन पर निर्दलय विधायक विजयी हुए। पूरे देश में जिस तरह से बीजेपी की लहर चल रही है और सरकारें रिपीट हो रही है ऐसे में बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा और बीजेपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को भी सरकार के रिपीट होने की पूर्ण संभावना थी। ऐसे में बीजेपी की हार को पचा पाना दोनों के लिए आसान नहीं था। राजनितिक विश्लेषक मानते है कि हिमाचल का “मिशन लोटस” मोदी -शाह की बजाय नड्डा-जयराम की परिकल्पना थी। बतौर दुनिया और देश की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष अपने ही गृह राज्य में बीजेपी की हार को नड्डा ओर जयराम को कबूल करना मुश्किल लगा।
हिमाचल जैसे शांत प्रदेश में जिसकी सादगी और ईमानदारी की देशभर में लोग मिसाल देते हैं ऐसे में नेताओं के दलबदल को आम जनमानस भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। कांग्रेस सौर सीएम ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने दलबदल, धनबल और एक बहुमत सरकार को गिराने का नैतिक दाव खेला है। जिसके जवाब देने में कांग्रेस से बीजेपी में गए विधायकों को परेशानी आना लाज़मी है। इसके अलावा बीजेपी को अपने उन नेताओं को सँभालने में भी दिक्कत आ रही है जो बरसों से इनके खिलाफ कई आरोप लगा कर चुनाव लड़ रह थे।
हिमाचल में कांग्रेस की सरकार बनाने में प्रियंका गाँधी की अहम् भूमिका रही है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी प्रियंका गाँधी हिमाचल में डटी रही और सरकार के अस्थिर होने पर भी प्रियंका ने संकट मोचन बनकर मोर्चा संभाला था। हालाँकि मोदी जी हिमाचल को अपना दूसरा घर कहते हैं तो प्रियंका गाँधी का शिमला में अपना घर होने से खुद को मज़बूती के साथ हिमाचल से जोड़ती है। इस समय जहाँ बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा और नेता प्रतिपक्ष जयराम प्रदेश के चुनाव की बागडोर संभाले हुए हैं वहीं कांग्रेस की और से प्रियंका गाँधी और सीएम सुक्खू ने मोर्चा संभाला है।
बीजेपी ने मिशन लोटस और विधायकों के इस्तीफे करवाकर फिर बीजेपी के टिकट देने का निर्णय लोकसभा चुनाव को देखते हुए ही किया। उन्हें पूरा यकीन था कि लोकसभा के साथ होने वाले उपचुनाव में मोदी लहर के साथ पार्टी आराम से सभी उपचुनाव जीत लेगी और फिर सत्ता परिवर्तन कर लेगी, जिसके लिए तीन निर्दलय विधायकों को भी पार्टी में शामिल करके इस्तीफा दिलवा दिया।
ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष तीनों निर्दलयों के इस्तीफे नामंजूर कर दिए और फिर इस विषय पर जाँच बिठा दी की ये इस्तीफे किसी दबाव में तो नहीं दिए गए हैं। निर्दलय विधायक हाईकोर्ट भी गए और विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफे मंज़ूर करने की जहर लगाई, जहाँ से उन्हें नाकामी हाथ लगी और यहीं मिशन लोटस मात खा गया। अब यदि बीजेपी सभी छः उपचुनाव जीत भी जाती है जो मुमकिन नहीं लगता, फिर भी सरकार का गिरना असंभव होगा क्योंकि सरकार के साथ 34 विधायक है और बीजेपी 31सीटों पर पहुँच कर भी सत्ता पक्ष से पीछे ही रहेगी।
लोकसभा में भी कांग्रेस ने मज़बूत प्रत्याशी देकर मुकाबले को रोचक बना दिया है। कंगना के खिलाफ युवा नेता लोकनिर्माण मंत्री विक्रमादित्य को उतारकर जयराम ठाकुर को मंडी तक सिमित कर दिया। इसी तरह हमीरपुर सीट से बेशक पूर्व विधायक सतपाल रायज़ादा केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की बराबरी के नेता नहीं है लेकिन सीएम और डिप्टी सीएम दोनों हमीरपुर लोकसभा सीट से आते हैं। ऐसे में सीधा मुकाबला सरकार और अनुराग ठाकुर के बीच है। काँगड़ा से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा और शिमला से छः बार के सांसद रहे केडी सुल्तानपुरी के पुत्र कसौली से विधायक विनोद सुल्तानपुरी को मैदान में उतारकर लोकसभा की सभी सीटों पर बीजेपी को कड़ी टक्कर दे रही है। अंततः असली तस्वीर 4 जून को चुनाव परिणाम पर ही साफ होगी।

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