रजत जयंती सत्र में मूल निवास, भू-कानून और गैरसैंण जैसे जनमुद्दों पर गूंजी सदन की आवाज
हमारी पंचायत, देहरादून
उत्तराखण्ड राज्य गठन के रजत जयंती वर्ष में आयोजित विशेष विधानसभा सत्र में जनभावनाओं और बुनियादी सवालों की गूंज पहले दिन से ही सुनाई दी। विधायकों ने विकास, भ्रष्टाचार, पलायन, भू-कानून, गैरसैंण, परिसीमन और अफसरशाही की मनमानी जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।
सदन में हुई बहस ने इस बात के संकेत दिए कि 25 साल बाद भी राज्य की आत्मा अब भी अपने मूल मुद्दों के समाधान की तलाश में है।
अफसरशाही पर विपक्ष का निशाना
सत्र के पहले दिन नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि राज्य में अफसरशाही बेलगाम होती जा रही है और जनप्रतिनिधियों की बात अनसुनी की जा रही है। उपनेता प्रतिपक्ष भुवन कापड़ी ने विधायक निधि में 15 प्रतिशत तक की कथित कटौती का मामला उठाते हुए अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया।
कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों ने अपने-अपने राष्ट्रीय नेतृत्व — सोनिया गांधी, एन.डी. तिवारी और अटल बिहारी वाजपेयी — की राज्य निर्माण में भूमिका को रेखांकित किया। बहस के दौरान कई बार सदन में तीखी नोकझोंक भी हुई, तो कहीं हल्के-फुल्के प्रसंगों ने माहौल को सहज बना दिया।
“मूल निवास” पर विनोद चमोली का तीखा हमला
मंगलवार को भाजपा विधायक और राज्य आंदोलनकारी विनोद चमोली ने “मूल निवास” का मुद्दा उठाकर पूरे सदन को आंदोलित कर दिया।
उन्होंने कहा — “उत्तराखण्ड को धर्मशाला बना दिया गया है। दस–पन्द्रह साल पहले आए लोग यहां की ज़मीनों और संसाधनों पर काबिज हो गए हैं, जबकि असली पहाड़ी आज भी उपेक्षित है।”
चमोली ने सवाल किया कि राज्य गठन के 25 साल बाद भी मूल निवास की अवधि (कट-ऑफ डेट) क्यों तय नहीं हो सकी। उन्होंने कहा, “हर राज्य में मूल निवास के स्पष्ट मानक हैं, मगर उत्तराखण्ड में आज भी यह अस्पष्ट है कि असली उत्तराखण्डी कौन है।” उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार स्पष्ट कानून बनाए, ताकि भूमि, रोजगार और संसाधनों में स्थानीयों की प्राथमिकता सुनिश्चित की जा सके।
गैरसैंण और अफसरशाही पर नाराजगी
विनोद चमोली ने गैरसैंण में मिनी सचिवालय न बनाए जाने पर भी तीखा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि अगर गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है, तो वहाँ अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी की तैनाती क्यों नहीं हुई?
हालांकि “पहाड़ बनाम मैदान” की बहस के बीच कांग्रेस विधायक अनुपमा रावत समेत कुछ विधायकों ने चमोली के बयान का विरोध किया।
स्पीकर ऋतु खंडूड़ी और संसदीय कार्य मंत्री सुबोध उनियाल के हस्तक्षेप से सदन में शांति बहाल हुई।
जनता के मन का सवाल: कौन है असली उत्तराखण्डी?
राज्य गठन के बाद से “मूल निवास” का प्रश्न लगातार विवादों में रहा है। हाईकोर्ट ने 2012 में कहा था कि “9 नवम्बर 2000 को जो व्यक्ति राज्य की सीमा में था, वही मूल निवासी माना जाएगा।” लेकिन कई सामाजिक संगठनों का तर्क है कि यह तिथि बहुत हाल की है — अन्य राज्यों में 1950 या उससे पहले की तारीख को मानक बनाया गया है।
इस मसले से तीन बड़ी चुनौतियाँ जुड़ी हैं —
कानूनी परिभाषा का अभाव,
भूमि खरीद और भू-उपयोग नीति में असंतुलन,
रोजगार में स्थानीय प्राथमिकता की कमी
भविष्य की दिशा
“मूल निवास”, “भू-कानून” और “गैरसैंण” अब केवल राजनीतिक बहस के मुद्दे नहीं रहे, बल्कि ये जनभावनाओं की नब्ज़ बन चुके हैं।
यदि सरकार ने इन विषयों पर स्पष्ट नीति नहीं बनाई, तो आने वाले वर्षों में सामाजिक असंतोष और नए जनआंदोलन की पृष्ठभूमि बन सकती है।
कांग्रेस विधायक लखपत बुटोला ने भी पर्वतीय क्षेत्रों के परिसीमन में हुए नुकसान पर चिंता जताते हुए कहा कि “2001 की जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण, पर्वतीय जिलों के साथ अन्याय है।”
स्पष्ट है — रजत जयंती सत्र केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी बन गया है। भाजपा विधायक विनोद चमोली के सवालों ने यह संदेश दे दिया है कि उत्तराखण्ड की नई राजनीतिक यात्रा जनता के असली मुद्दों पर ही टिकेगी।

