अरबों की हाइड्रो योजनाएँ बनी बोझ, उत्तराखंड की अधूरी हाइड्रो परियोजनाओं की सच्चाई
हमारी पंचायत, देहरादून
देहरादून। उत्तराखंड को “भारत का पावर हब” कहा जाता रहा है — यहाँ नदियों की तीव्र धारा और ऊँचाई जलविद्युत उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि राज्य की कई बड़ी जलविद्युत परियोजनाएँ वर्षों से अधूरी पड़ी हैं या बंद पड़ी हैं।
इन पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन न तो बिजली बनी, न मुनाफा हुआ — उल्टे देरी, लागत में बढ़ोतरी और प्राकृतिक आपदाओं ने इन प्रोजेक्ट्स को घाटे का सौदा बना दिया है।

क्यों अटक गईं परियोजनाएँ?
2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की सभी नई जलविद्युत परियोजनाओं पर पर्यावरण और भू-सुरक्षा के गहन अध्ययन तक रोक लगा दी थी। इस आदेश के बाद कई योजनाओं को फिर से मंजूरी नहीं मिल सकी।
दूसरी बड़ी वजह भूगर्भीय और जलवायु जोखिम हैं — पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने और अनियमित बारिश के कारण निर्माण कार्य कई बार रुकते रहे।
तीसरा कारण वित्तीय और अनुबंध संबंधी दिक्कतें हैं। कई निजी कंपनियाँ समय पर पूंजी नहीं जुटा सकीं या दिवालिया हो गईं, जिससे प्रोजेक्ट अधर में लटक गए।
बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ जो अधूरी पड़ी हैं
| परियोजना | क्षमता | स्थिति / कारण |
| Tapovan–Vishnugad (NTPC) | 520 MW | 2013 व 2021 की आपदाओं में भारी क्षति, जोशीमठ भूमि धँसाव के बाद कार्य रुका; लागत में ₹4,000 करोड़ से अधिक की बढ़ोतरी |
| Lata–Tapovan (NTPC) | 171 MW | 2013 के बाद सुप्रीम कोर्ट रोक व पर्यावरण मंज़ूरी न मिलने से ठप |
| Phata–Byung (LANCO) | 76 MW | 70% निर्माण के बाद 2013 की बाढ़ में नुकसान; कंपनी वित्तीय संकट में |
| Vyasi (UJVNL) | 120 MW | दशकों तक निर्माण अधूरा, तकनीकी और पर्यावरणीय देरी |
कितना होता मुनाफ़ा?
अगर ये परियोजनाएँ समय पर शुरू हो जातीं, तो हर साल राज्य और कंपनियों को सैकड़ों करोड़ रुपये की आय हो सकती थी। उदाहरण के लिए:
– Tapovan–Vishnugad (520 MW) से अनुमानित वार्षिक उत्पादन लगभग 2,050 मिलियन यूनिट (MU) होता। ₹4 प्रति यूनिट की दर से यह लगभग ₹820 करोड़ प्रति वर्ष, और ₹6 की दर से लगभग ₹1,230 करोड़ की आय देता।
– Lata–Tapovan (171 MW) से सालाना लगभग ₹270–400 करोड़,
– Phata–Byung (76 MW) से ₹120–180 करोड़,
– Vyasi (120 MW) से पुराने अनुमानों के अनुसार लगभग ₹100 करोड़ प्रतिवर्ष की आय की उम्मीद थी।
कुल मिलाकर, सिर्फ इन चार परियोजनाओं से ही सालाना ₹1,300–1,900 करोड़ की बिजली बिक्री संभव थी।
कितना हुआ नुकसान?
– लागत में बढ़ोतरी: सरकारी रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड की कुछ बड़ी हाइड्रो परियोजनाओं में 2023 तक लगभग ₹31,000 करोड़ का लागत-ओवररन हुआ है। Tapovan-Vishnugad अकेले में ₹4,000 करोड़ से अधिक की लागत बढ़ चुकी है।
– भौतिक क्षति: 2021 में Tapovan परियोजना को ग्लेशियर टूटने से ₹450–1,500 करोड़ तक का सीधा नुकसान बताया गया था।
– अवसर लागत: वर्षों तक बिजली उत्पादन न होने से राज्य ने हजारों करोड़ रुपये की संभावित कमाई खो दी।
– स्थानीय नुकसान: सड़कें, सुरंगें और गाँव प्रभावित हुए; कुछ इलाकों में पर्यावरणीय असंतुलन और विस्थापन के मुद्दे भी बढ़े।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं का भविष्य दो दिशा में बँटता है —
1. जो परियोजनाएँ भूगर्भीय रूप से सुरक्षित हैं, उन्हें आधुनिक तकनीक, जलवायु जोखिम के मूल्यांकन और वित्तीय पुनर्गठन के साथ पूरा किया जाए।
2. जो परियोजनाएँ पर्यावरण या भू-सुरक्षा के लिहाज़ से जोखिम भरी हैं, उन्हें स्थायी रूप से बंद कर देना ही बेहतर होगा, ताकि और पैसा न डूबे।
उत्तराखंड की अधूरी जलविद्युत परियोजनाएँ इस बात का उदाहरण हैं कि प्राकृतिक संवेदनशील इलाकों में बिना समुचित योजना के बड़े निवेश किस तरह “मुनाफे” की जगह “नुकसान” में बदल जाते हैं। समय पर काम पूरा होता तो आज राज्य को सस्ती, स्वच्छ और स्थिर ऊर्जा के साथ-साथ अरबों रुपये की आमदनी होती।
अब ज़रूरत है पारदर्शी नीति, मजबूत भू-विज्ञानिक अध्ययन और वित्तीय अनुशासन की — ताकि भविष्य में नदियों की ताकत घाटे का नहीं, विकास का साधन बने।

