ओलों से उजड़ी उम्मीदें, नीति पर सवाल

ओलों से उजड़ी उम्मीदें, नीति पर सवाल

त्यूणी-मोरी-चकराता के सेब पट्टों में आंशिक बचाव, लेकिन व्यापक सुरक्षा और जागरूकता अब भी अधूरी

हमारी पंचायत, देहरादून

यमुना-टोंस घाटी में हाल ही में हुई ओलावृष्टि ने एक बार फिर पहाड़ की बागवानी और कृषि व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। उत्तरकाशी के मोरी विकासखंड, देहरादून की त्यूणी तहसील और चकराता क्षेत्र—जो प्रदेश के प्रमुख सेब उत्पादक पट्टों में शामिल हैं—इस आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

नागथात, माख्टी पोखरी, कोटी-कनासर, पुरोला और मोरी सहित कई गांवों में तेज ओलावृष्टि ने सेब, खुमानी, प्लम और आड़ू के बगीचों को भारी नुकसान पहुंचाया। यह समय फूल आने का होता है, जो भविष्य की फसल की नींव रखते हैं, लेकिन ओलों की मार ने इन फूलों को झाड़ दिया, जिससे किसानों की पूरी सीजन की उम्मीदों पर पानी फिर गया।

इस प्राकृतिक आपदा ने केवल बागवानी ही नहीं, बल्कि सब्जी उत्पादन को भी गहरी चोट पहुंचाई है। लहसुन, प्याज और धनिया जैसी नकदी फसलें पूरी तरह प्रभावित हुई हैं। ये फसलें जहां किसानों की आय का प्रमुख स्रोत थीं, वहीं स्थानीय बाजारों की आपूर्ति भी इन्हीं पर निर्भर थी। इनके नुकसान से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा झटका लगा है। साथ ही, नई लगाई गई पौध और कलमों के नष्ट होने से आने वाले वर्षों का उत्पादन भी प्रभावित होने की आशंका है।

हालांकि, इस बार एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। त्यूणी, मोरी और चकराता के कुछ प्रगतिशील बागवानों ने अपने स्तर पर एंटी-हेल नेट (हेल नेट) लगाए थे। जिन बागानों में यह सुरक्षा व्यवस्था थी, वहां नुकसान अपेक्षाकृत कम हुआ। यह साफ संकेत देता है कि आधुनिक तकनीकों को अपनाकर प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

लेकिन दूसरी ओर बड़ी संख्या में किसान आज भी इन सुविधाओं से वंचित हैं। जिन बागानों में हेल नेट नहीं लगे थे, वहां लगभग पूरी फसल तबाह हो गई। यह अंतर केवल आर्थिक संसाधनों का नहीं, बल्कि सरकारी नीति और उसके प्रभावी क्रियान्वयन का भी है।

विडंबना यह है कि राज्य सरकार एक ओर उत्तराखंड को फल उत्पादन और बागवानी के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर सुरक्षा उपायों का अभाव साफ नजर आता है। एंटी-हेल नेट जैसी बुनियादी तकनीक के प्रति न तो बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं और न ही इसे व्यापक रूप से सब्सिडी के साथ लागू किया जा रहा है।

तुलनात्मक रूप से देखें तो हिमाचल प्रदेश ने बागवानी क्षेत्र में बेहतर नीतियों और मजबूत ढांचे के जरिए न केवल उत्पादन बढ़ाया है, बल्कि किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से भी काफी हद तक सुरक्षित किया है। वहां एंटी-हेल नेट, आधुनिक बागवानी तकनीक और सरकारी सहयोग ने किसानों को सशक्त बनाया है। यही वजह है कि सीमांत क्षेत्र होने के बावजूद उत्तराखंड के कई किसान भी वहां के मॉडल से प्रेरणा लेकर अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।

यह स्थिति स्पष्ट करती है कि उत्तराखंड में संभावनाओं की कमी नहीं है, बल्कि आवश्यकता मजबूत नीति, संसाधनों की पहुंच और प्रभावी क्रियान्वयन की है। यदि प्रमुख बागवानी क्षेत्रों में ही सुरक्षा उपाय सुनिश्चित नहीं किए जाते, तो हर साल इस तरह की आपदाएं किसानों की मेहनत को बर्बाद करती रहेंगी।

अब जरूरत है कि सरकार केवल राहत और मुआवजे तक सीमित न रहे, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति अपनाए। एंटी-हेल नेट पर सब्सिडी, किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और सटीक मौसम पूर्वानुमान जैसी सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए। तभी पहाड़ का किसान सुरक्षित और आत्मनिर्भर बन सकेगा।

पहाड़ का किसान हर साल प्रकृति से संघर्ष करता है, लेकिन जब नीतिगत समर्थन कमजोर हो, तो यह संघर्ष और कठिन हो जाता है। यदि उत्तराखंड को वास्तव में फल उत्पादन का मजबूत केंद्र बनाना है, तो बागवानों को सुरक्षा और संसाधनों से लैस करना ही होगा—वरना हर ओलावृष्टि के साथ “ओलों की मार, नीतियों की हार” की यह तस्वीर दोहराती रहेगी।

1 Comment

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