हमारी पंचायत, देहरादून
उत्तराखंड अपने गठन के 25 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है, लेकिन देहरादून जनपद का चकराता—जो अनुसूचित जनजाति (ST) क्षेत्र है—और उत्तरकाशी का पुरोला—जो अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) बहुल क्षेत्र है—आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दोनों पड़ोसी क्षेत्रों की भौगोलिक दूरी भले कम हो, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की कमी ने यहां की महिलाओं और नवजातों के जीवन को गहरे संकट में डाल रखा है। पहाड़ की इन वादियों में मां बनना आज भी एक जोखिम भरी यात्रा है, जहां हर कदम पर अनिश्चितता और भय साथ चलता है।
दुनिया भर में संस्थागत प्रसव को सुरक्षित मातृत्व की सबसे अहम शर्त माना जा रहा है। सरकारें अस्पतालों में प्रसव बढ़ाने के लिए योजनाएं चला रही हैं, लेकिन चकराता और पुरोला की जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। यहां आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं स्थानीय दाइयों के भरोसे प्रसव कराने को मजबूर हैं। यह परंपरा नहीं, बल्कि मजबूरी की तस्वीर है—क्योंकि अस्पताल तक पहुंच पाना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
इन क्षेत्रों के कई गांव आज भी सड़क सुविधा से पूरी तरह नहीं जुड़े हैं। परिवहन के अभाव में गर्भवती महिलाओं को प्रसव पीड़ा के बीच कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है—कभी डोली में, कभी परिजनों के कंधों पर। तंग पगडंडियां, ऊबड़-खाबड़ रास्ते और नदी-नालों पर बने झूला पुल इस यात्रा को और खतरनाक बना देते हैं। कई बार दर्द इतना बढ़ जाता है कि वही झूला पुल, कच्ची सड़क या खेत प्रसव स्थल बन जाते हैं—और ऐसे मामले क्षेत्र में बार-बार सामने आते रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, हर वर्ष ऐसी घटनाएं होती हैं जब महिलाओं को रास्ते में ही बच्चों को जन्म देना पड़ता है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है। कई मामलों में समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण गर्भवती महिलाओं या नवजात शिशुओं की जान भी चली गई है—ऐसी घटनाएं जो अक्सर आंकड़ों में पूरी तरह दर्ज भी नहीं हो पातीं और पहाड़ की खामोशी में दब जाती हैं।
सरकार की ओर से क्षेत्र में अस्पतालों का निर्माण जरूर किया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इनमें से कई अस्पताल “सफेद हाथी” साबित हो रहे हैं। भवन खड़े हैं, लेकिन सुविधाएं नदारद हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि चकराता क्षेत्र के त्यूनी और चकराता, तथा पुरोला क्षेत्र के मोरी, पुरोला और नौगांव जैसे बड़े इलाकों में एक भी महिला प्रसूति विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट) तैनात नहीं है।
प्रसूति सेवाओं के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा—जैसे सुसज्जित लेबर रूम, आपातकालीन ऑपरेशन (सी-सेक्शन) की सुविधा, नवजात शिशु देखभाल इकाई—अधिकांश केंद्रों में या तो उपलब्ध नहीं है या नाममात्र की स्थिति में है। ऐसे में अस्पताल केवल रेफरल सेंटर बनकर रह जाते हैं, जहां से मरीजों को आगे भेज दिया जाता है।
आंकड़ों के स्तर पर देखें तो उत्तराखंड में मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) राष्ट्रीय औसत के आसपास या उससे अधिक दर्ज की गई है, लेकिन चकराता और पुरोला जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में यह स्थिति और भी गंभीर मानी जाती है। जब प्रसव असुरक्षित परिस्थितियों में होता है और विशेषज्ञ चिकित्सा उपलब्ध नहीं होती, तो मामूली जटिलता भी जानलेवा बन जाती है।
एम्बुलेंस सेवाएं—102 और 108—इन इलाकों में कागजों पर राहत का माध्यम जरूर हैं, लेकिन दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण इनकी पहुंच सीमित है। कई बार एम्बुलेंस गांव तक पहुंच ही नहीं पाती और मरीज को पहले सड़क तक लाना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। इस देरी के कारण कई परिवारों को विकासनगर या हिमाचल प्रदेश के अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ता है।
स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और स्टाफ की कमी, उपकरणों का अभाव और विशेषज्ञ सेवाओं की अनुपस्थिति इस पूरे संकट को और गहरा बना रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है—चकराता की जनजातीय और पुरोला की पिछड़ी आबादी आखिर अपनी पीड़ा लेकर जाए तो जाए कहां?
रजत जयंती के इस दौर में, जब विकास के दावे अपने चरम पर हैं, तब इन पहाड़ी इलाकों में एक मां का सुरक्षित प्रसव अब भी सुनिश्चित नहीं हो पाया है। यहां आज भी कई नवजात अपनी पहली सांस अस्पताल में नहीं, बल्कि रास्तों, पुलों और मजबूरियों के बीच लेते हैं—और यही इस पूरे तंत्र की सबसे बड़ी हकीकत बनकर सामने आता है।

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