धामी सरकार का फैसला: नैतिक शिक्षा और भारतीय संस्कृति के नाम पर लागू होगा गीता श्लोक पाठ, विपक्ष ने बताया वैचारिक एजेंडा
हमारी पंचायत, देहरादून
उत्तराखंड की शिक्षा नीति एक बार फिर बड़े राजनीतिक और वैचारिक विमर्श के केंद्र में आ गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में श्रीमद् भगवद् गीता के श्लोकों का पाठ अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। सरकार का दावा है कि यह कदम विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों, अनुशासन, कर्तव्यबोध और जीवन दृष्टि को विकसित करने की दिशा में उठाया गया है। वहीं विपक्ष ने इस फैसले को शिक्षा के माध्यम से एक खास वैचारिक सोच को स्थापित करने का प्रयास बताते हुए तीखा विरोध दर्ज कराया है।
सरकार के अनुसार, गीता पाठ को किसी धार्मिक अनुष्ठान की तरह नहीं बल्कि नैतिक शिक्षा के हिस्से के रूप में लागू किया जाएगा। चयनित श्लोकों का पाठ प्रार्थना सभा या नैतिक शिक्षा की कक्षा के दौरान कराया जाएगा और इसे परीक्षा या अंक आधारित विषय नहीं बनाया जाएगा। शिक्षा विभाग को निर्देश दिए गए हैं कि पाठ्यक्रम की रूपरेखा इस तरह तैयार की जाए, जिससे छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव न पड़े।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि श्रीमद् भगवद् गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है। इसमें कर्म, उत्तरदायित्व, आत्मसंयम और संतुलन जैसे मूल्य निहित हैं, जो आज के तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धी समय में विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं। सरकार यह भी तर्क दे रही है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है और गीता पाठ उसी दिशा में उठाया गया कदम है।
हालांकि, इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सवाल उठाया है कि सरकारी स्कूलों में किसी एक धार्मिक ग्रंथ को अनिवार्य करना संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के अनुरूप कैसे है। विपक्ष का आरोप है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र को राजनीतिक और वैचारिक प्रयोगशाला बनाया जा रहा है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि राज्य के स्कूलों में विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के छात्र पढ़ते हैं, ऐसे में नैतिक शिक्षा को समावेशी और सर्वमान्य रूप में लागू किया जाना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल शिक्षा सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी छिपा है। उत्तराखंड एक धार्मिक और तीर्थ प्रधान राज्य है, जहां सांस्कृतिक मुद्दे हमेशा से राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। ऐसे में गीता पाठ को अनिवार्य करना भाजपा के उस वैचारिक एजेंडे को मजबूती देता है, जिसमें संस्कृति, राष्ट्रवाद और शिक्षा को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश दिखाई देती है। आगामी निकाय, पंचायत और 2027 विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस फैसले को राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।
दूसरी ओर, संत समाज, कई सामाजिक संगठनों और अभिभावकों के एक बड़े वर्ग ने इस निर्णय का समर्थन किया है। उनका कहना है कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों और संस्कारों की कमी लगातार महसूस की जा रही है। तकनीक और प्रतिस्पर्धा के दौर में बच्चे मानसिक दबाव का सामना कर रहे हैं और गीता जैसे ग्रंथ उन्हें जीवन में संतुलन और आत्मबल प्रदान कर सकते हैं। समर्थकों का तर्क है कि जब योग और ध्यान को वैश्विक मान्यता मिल चुकी है, तब गीता को शिक्षा से जोड़ने पर आपत्ति अनुचित है।
शिक्षाविदों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि गीता के श्लोकों को दर्शन और जीवन मूल्यों के रूप में पढ़ाया जाए, तो यह छात्रों के लिए उपयोगी हो सकता है। वहीं कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि नैतिक शिक्षा जरूरी है, लेकिन उसे किसी एक धार्मिक ग्रंथ तक सीमित करने के बजाय विभिन्न परंपराओं और विचारधाराओं से जोड़कर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य सवाल करने और सोचने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए, न कि किसी एक विचार को स्थापित करना।
कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से भी यह फैसला चर्चा में है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसे पूरी तरह बाध्यकारी और अनिवार्य बनाया गया, तो यह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है। पूर्व में देश के अन्य राज्यों में भी शिक्षा और धर्म से जुड़े मामलों पर अदालतों में बहस होती रही है। फिलहाल राज्य सरकार यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रही है कि यह फैसला किसी धार्मिक आस्था को थोपने के लिए नहीं, बल्कि मूल्य आधारित शिक्षा को सुदृढ़ करने के लिए है।
साप्ताहिक दृष्टि से देखें तो गीता पाठ को अनिवार्य करने का निर्णय उत्तराखंड की राजनीति में एक अहम मोड़ है। यह फैसला शिक्षा नीति, सामाजिक विमर्श और राजनीतिक रणनीति—तीनों स्तरों पर असर डालने वाला है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि सरकार इसे किस तरह लागू करती है और क्या यह कदम छात्रों के व्यक्तित्व विकास में सकारात्मक भूमिका निभा पाता है।
फिलहाल इतना तय है कि स्कूलों में गीता पाठ का यह निर्णय केवल एक शैक्षणिक आदेश नहीं, बल्कि संस्कृति, राजनीति और संविधान के बीच चल रही बहस का प्रतीक बन चुका है। यही कारण है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत के केंद्र में बना रहने वाला है।
