टिकट की जंग, विरोध की तपिश

टिकट की जंग, विरोध की तपिश

एक परिवार-एक टिकट’ से कांग्रेस में बढ़ी बेचैनी, भाजपा में भी विरोध के सुर तेज

हमारी पंचायत, देहरादून

उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी बिसात तेजी से बिछने लगी है। विधानसभा चुनाव में अभी समय भले बाकी हो, लेकिन सत्ता और संगठन के भीतर हलचल तेज हो चुकी है। नेता अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं, टिकट के दावेदार जनता के बीच मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं और सोशल मीडिया के जरिए भी राजनीतिक ताकत दिखाने की होड़ मची हुई है। इसी बीच कांग्रेस का ‘एक परिवार-एक टिकट’ फार्मूला पार्टी के भीतर नई बहस और असहजता का कारण बन गया है, जबकि भाजपा को भी अपने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ बढ़ते विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

कांग्रेस में टिकट वितरण को लेकर सबसे अधिक चर्चा ‘एक परिवार-एक टिकट’ के सिद्धांत की है। नैनीताल से पूर्व विधायक संजीव आर्य द्वारा अपनी दावेदारी वापस लेकर इस फार्मूले का समर्थन करना पार्टी के कई बड़े नेताओं के लिए असहज स्थिति पैदा कर गया है। माना जा रहा है कि इस कदम के बाद कांग्रेस हाईकमान पर इस सिद्धांत को लागू करने का नैतिक दबाव और बढ़ गया है।

राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के परिवार को लेकर है। उनकी बेटी अनुपमा रावत पहले से विधायक हैं, जबकि पुत्र आनंद रावत और बीरेंद्र रावत के नाम भी संभावित दावेदारों में लिए जा रहे हैं। ऐसे में यदि पार्टी एक परिवार-एक टिकट के सिद्धांत पर सख्ती से अमल करती है तो सबसे बड़ी चुनौती वरिष्ठ नेताओं के सामने ही खड़ी होगी।

इसी प्रकार नेता प्रतिपक्ष रह चुके प्रीतम सिंह के राजनीतिक परिवार पर भी सबकी नजर है। उनके पुत्र पहले से जिला पंचायत की राजनीति में सक्रिय हैं और विधानसभा चुनाव में दावेदारी की चर्चाएं भी लगातार बनी हुई हैं। यदि पार्टी फार्मूले पर अडिग रहती है तो कई नेताओं की रणनीति बदलनी पड़ सकती है।

दूसरी ओर गणेश गोदियाल, हरक सिंह रावत, रणजीत रावत समेत कई वरिष्ठ नेता फिलहाल अपने लिए सुरक्षित और मजबूत सीट तलाशने में जुटे हैं। हरक सिंह रावत इस बार स्वयं चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। वहीं, पूर्व में परिवार के अन्य सदस्यों के लिए टिकट की चर्चाओं के बीच अब उनका पूरा फोकस अपनी राजनीतिक वापसी पर माना जा रहा है। रणजीत रावत भी इस बार परिवार के बजाय अपने राजनीतिक भविष्य को प्राथमिकता देते दिखाई दे रहे हैं।

राजनीतिक हलचल केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। भाजपा में भी जनप्रतिनिधियों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन लगातार बढ़ रहे हैं। कई मंत्रियों और विधायकों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में विरोध का सामना करना पड़ा है। इससे पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ी है, क्योंकि चुनाव से पहले बढ़ता जन असंतोष टिकट वितरण को सीधे प्रभावित कर सकता है।

भाजपा के अंदरूनी सर्वे भी कई सीटों पर चुनौतीपूर्ण स्थिति का संकेत दे रहे हैं। संगठन प्रदर्शन के आधार पर टिकट तय करने की रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में कमजोर प्रदर्शन वाले विधायकों और विवादों में घिरे नेताओं के सामने टिकट बचाने की चुनौती खड़ी हो सकती है।

इधर, कांग्रेस के भीतर टिकट की दौड़ और भाजपा में बढ़ता जनविरोध यह संकेत दे रहा है कि 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि दोनों प्रमुख दलों के भीतर नेतृत्व, संगठन और टिकट वितरण की बड़ी परीक्षा भी बनने जा रहा है। आने वाले महीनों में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल सकते हैं और कई स्थापित चेहरे भी नई परिस्थितियों में कठिन मुकाबले का सामना करते नजर आ सकते हैं।

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