भारतीय भाषा पुस्तक योजना पर ऋषिकेश में मंथन

भारतीय भाषा पुस्तक योजना पर ऋषिकेश में मंथन

नोडल संस्थानों, विशेषज्ञ समूह और राज्य स्तरीय कार्ययोजना के खाके पर बनी सहमति

हमारी पंचायत, देहरादून

ऋषिकेश। भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण साहित्य, अकादमिक पुस्तकों और शोध सामग्री के विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर, ऋषिकेश में “भारतीय भाषा पुस्तक योजना : भारतीय भाषाओं के संवर्धन हेतु” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी एवं परिचर्चा आयोजित की गई।

श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय तथा शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में शिक्षाविदों, भाषा विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर व्यापक विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति प्रो. एन.के. जोशी, परिसर निदेशक प्रो. एम.एस. रावत, भारतीय भाषा समिति के संयोजक प्रो. विजय प्रकाश श्रीवास्तव, राज्य समन्वयक प्रो. अल्का सूरी, प्रो. एन.डी. काण्डपाल तथा मुख्य वक्ता डॉ. के. गिरिधर राव ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एन.के. जोशी ने कहा कि भारतीय भाषाएं देश की ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की आधारशिला हैं। उन्होंने कहा कि मातृभाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तकों का सृजन ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। विद्यार्थियों और शोधार्थियों को उनकी भाषा में बेहतर अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने से शिक्षा अधिक प्रभावी और समावेशी बनेगी। उन्होंने भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट लेखन को प्रोत्साहन देने के लिए विश्वविद्यालय स्तर पर विशेष पहल करने का भी आश्वासन दिया।

मुख्य वक्ता एवं भारतीय भाषा समिति के शैक्षिक समन्वयक डॉ. के. गिरिधर राव ने भारतीय भाषा पुस्तक योजना की राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय संरचना, उद्देश्यों तथा क्रियान्वयन प्रक्रिया पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि योजना का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में मौलिक लेखन, अनुवाद, संदर्भ पुस्तकों और उच्च शिक्षा से जुड़ी सामग्री का विकास करना है। इसके लिए विभिन्न स्तरों पर समितियों का गठन कर पुस्तक चयन, लेखन और प्रकाशन की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जाएगा।

राज्य समन्वयक प्रो. अल्का सूरी और प्रो. एन.डी. काण्डपाल ने भारतीय भाषाओं में अकादमिक एवं शोधपरक साहित्य के विकास तथा स्थानीय ज्ञान परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इस योजना के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय विषयों पर आधारित साहित्य को भी नई पहचान मिलेगी।

भोजनावकाश के बाद आयोजित तकनीकी सत्र में प्रतिभागियों ने योजना के क्रियान्वयन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान संभावित नोडल संस्थानों की पहचान, उनकी तैयारियों का आकलन, संभावित लीड संस्थानों की सूची तैयार करने, राज्य स्तरीय विशेषज्ञ समूह के गठन तथा आगामी तीन माह की कार्ययोजना को अंतिम रूप देने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। साथ ही गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में पृथक-पृथक दो दिवसीय कार्यशालाओं के आयोजन की संभावनाओं और तैयारियों पर भी चर्चा हुई।

संगोष्ठी में सर्वसम्मति से योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य बिंदुओं पर सहमति बनी। इनमें नोडल और लीड संस्थानों के चयन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना, विशेषज्ञ समूह के सदस्यों की पहचान करना तथा राज्य आधारित कार्ययोजना तैयार करना प्रमुख रहा।

कार्यक्रम में प्रो. कंचन लता सिन्हा, प्रो. वी.के. गुप्ता, प्रो. वी.एन. गुप्ता, प्रो. सीमा बेनीवाल, प्रो. अनीता तोमर, प्रो. हेमलता मिश्रा, प्रो. दिनेश शर्मा, डॉ. ममता सिंह, डॉ. लता पाण्डेय, डॉ. उर्वशी पाण्डेय तथा पर्यावरणविद् डॉ. विनोद प्रसाद जुगलान सहित अनेक शिक्षाविद उपस्थित रहे। डॉ. गौरव रावत ने कार्यक्रम का संचालन किया। संगोष्ठी का समापन भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।

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