27 अक्टूबर से विधानसभा सत्र, स्थानीय लोगों ने उठाई गैरसैंण को जिला बनाने की मांग; राजधानी के मुद्दे पर भाजपा-कांग्रेस की भूमिका पर सवाल।
हमारी पंचायत, गैरसैंण
उत्तराखंड विधानसभा का वर्ष 2026 का तीसरा सत्र 27 अक्टूबर से गैरसैंण के भराड़ीसैंण विधानसभा भवन में शुरू होने जा रहा है। सत्र की तैयारियां अंतिम चरण में हैं, लेकिन इसके साथ ही प्रदेश की स्थायी राजधानी का सवाल एक बार फिर चर्चा में आ गया है। राज्य गठन के 26 साल बाद भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी का दर्जा नहीं मिलने से स्थानीय लोगों और राज्य आंदोलनकारियों में नाराजगी है। उनका कहना है कि राजधानी के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद क्षेत्र को अपेक्षित विकास नहीं मिल सका है। अब स्थानीय लोगों ने सत्र के दौरान गैरसैंण को पृथक जिला घोषित करने की मांग भी तेज कर दी है।
26 साल बाद भी अधूरी राजधानी की उम्मीद
उत्तराखंड का गठन लंबे जनसंघर्ष और आंदोलन के बाद 9 नवंबर 2000 को हुआ था। अलग राज्य की मांग के पीछे पर्वतीय क्षेत्रों का विकास, स्थानीय लोगों को रोजगार, प्रशासनिक सुविधाओं का विस्तार और पलायन पर रोक जैसे प्रमुख उद्देश्य थे। लोगों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ की जरूरतों के अनुरूप नीतियां बनाई जाएंगी और विकास का लाभ दूरस्थ गांवों तक पहुंचेगा।
हालांकि, राज्य गठन के बाद सत्ता में आई भाजपा और कांग्रेस की सरकारों के कार्यकाल में स्थायी राजधानी का मुद्दा निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंच सका। गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग समय-समय पर राजनीतिक बहस का हिस्सा बनती रही, लेकिन स्थायी राजधानी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
स्थानीय लोगों का मानना है कि गैरसैंण को केवल विधानसभा सत्रों तक सीमित रखने के बजाय इसे प्रशासनिक और विकास गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाया जाना चाहिए। उनका सवाल है कि यदि गैरसैंण को राजधानी के रूप में विकसित करने की मंशा थी, तो यहां बुनियादी ढांचा तैयार होने के बावजूद शासन-प्रशासन की नियमित गतिविधियां क्यों नहीं बढ़ाई गईं।
आयोगों की राय में उलझा राजधानी का फैसला
गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग पर अलग-अलग समय में गठित समितियों और आयोगों की सिफारिशें भी चर्चा का विषय रही हैं। कौशिक समिति ने गैरसैंण की भौगोलिक स्थिति को राजधानी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना था, जबकि दीक्षित आयोग ने भौगोलिक और तकनीकी परिस्थितियों के आधार पर अलग राय रखी।
इन अलग-अलग विचारों के बीच स्थायी राजधानी का सवाल राजनीतिक निर्णय की प्रतीक्षा करता रहा। परिणामस्वरूप गैरसैंण को लेकर घोषणाएं तो हुईं, लेकिन इसे पूर्ण प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी।
भराड़ीसैंण में करीब 300 करोड़ रुपये खर्च
गैरसैंण के भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास पर अब तक करीब 300 करोड़ रुपये खर्च होने का उल्लेख किया जा रहा है। जून 2014 में लगभग 30 एकड़ क्षेत्र में करीब 106 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से विधानसभा परिसर का निर्माण शुरू हुआ था। इस परियोजना की आधारशिला तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल, विधानसभा उपाध्यक्ष अनसूया प्रसाद मैखुरी और सतपाल महाराज की मौजूदगी में रखी गई थी।
भराड़ीसैंण में निर्मित विधानसभा भवन में पहला सत्र 17 नवंबर 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के कार्यकाल में आयोजित हुआ था। इसके बाद 4 मार्च 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने विधानसभा के बजट सत्र के दौरान गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया। राज्यपाल की मंजूरी के बाद 8 जून 2020 को इस संबंध में अधिसूचना जारी हुई।
ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होने के बावजूद गैरसैंण में नियमित प्रशासनिक गतिविधियों और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार को लेकर सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल विधानसभा सत्र आयोजित करने से राजधानी की अवधारणा पूरी नहीं होती। इसके लिए सरकारी कार्यालयों, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन जैसी सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है।
कमिश्नरी की घोषणा भी नहीं चढ़ी परवान
गैरसैंण को प्रशासनिक दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए 4 मार्च 2021 को तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इसे प्रदेश की तीसरी कमिश्नरी बनाने की घोषणा की थी। हालांकि, नेतृत्व परिवर्तन के बाद 9 अप्रैल 2021 को तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की कैबिनेट ने इस निर्णय को स्थगित कर दिया।
इस घटनाक्रम ने गैरसैंण के प्रशासनिक भविष्य को लेकर फिर सवाल खड़े किए। स्थानीय लोगों के अनुसार, बार-बार घोषणाएं होने और फैसलों के आगे नहीं बढ़ने से क्षेत्र के विकास की संभावनाएं प्रभावित हुई हैं।
वर्तमान में भराड़ीसैंण विधानसभा परिसर करीब 130 एकड़ क्षेत्र में फैला है। इसमें मुख्य विधानसभा भवन के अलावा विधायक आवास, मुख्यमंत्री आवास, मंत्रियों के आवास, अधिकारी हॉस्टल और कर्मचारी आवास जैसी सुविधाएं विकसित की गई हैं। परिसर में लगभग 65 एकड़ भूमि सचिवालय निर्माण के लिए भी प्रस्तावित है।
हालांकि, सचिवालय निर्माण का काम अब तक शुरू नहीं हो सका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2015 में इसके शुरुआती कार्य के लिए तीन करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी की गई थी। इसके बावजूद परियोजना आगे नहीं बढ़ने से गैरसैंण में स्थायी प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने की मंशा पर सवाल उठते रहे हैं।
सत्र से पहले गैरसैंण को जिला बनाने की मांग तेज
27 अक्टूबर से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र से पहले स्थानीय लोगों, जनप्रतिनिधियों और राज्य आंदोलनकारियों ने सरकार के सामने गैरसैंण को पृथक जिला घोषित करने की मांग रखी है। उनका कहना है कि सत्र के दौरान केवल औपचारिक बैठकें और राजनीतिक बयानबाजी न हों, बल्कि क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए ठोस फैसले भी लिए जाएं।
वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी सुरेश कुमार बिष्ट ने गैरसैंण में आयोजित होने वाले विधानसभा सत्रों के संदर्भ में क्षेत्र की अपेक्षाओं और समस्याओं का मुद्दा उठाया है। उनके अनुसार, राज्य आंदोलनकारियों और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने समय-समय पर मुख्यमंत्री तथा संबंधित विभागों के मंत्रियों से मिलकर क्षेत्र की आवश्यकताओं से जुड़े मांगपत्र सौंपे हैं।
स्थानीय लोगों की मांग है कि गैरसैंण को जिला बनाने से प्रशासनिक पहुंच बेहतर होगी और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान में मदद मिलेगी। उनका मानना है कि जिला बनने से विकास योजनाओं की निगरानी, सरकारी सेवाओं की उपलब्धता और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप प्रशासनिक फैसलों को गति मिल सकती है।
क्षेत्रीय विधायक अनिल नौटियाल ने भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी और जिला बनाने की दिशा में प्रयास किए जाने की बात कही है। वहीं, कांग्रेस ने ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में गैरसैंण से सरकार का संचालन करने और विधानसभा सत्र की अवधि बढ़ाने की मांग उठाई है। कांग्रेस नेता और नगर पंचायत अध्यक्ष मोहन भंडारी ने भी इस मुद्दे पर पार्टी का पक्ष रखा है।
घोषणाओं से आगे बढ़े सरकार, तभी पूरी होंगी उम्मीदें
गैरसैंण में प्रस्तावित विधानसभा सत्र एक बार फिर सरकार के सामने पहाड़ के विकास और राजधानी के सवाल पर अपनी नीति स्पष्ट करने का अवसर लेकर आया है। स्थानीय लोगों की अपेक्षा है कि सरकार स्थायी राजधानी के मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करे और गैरसैंण को जिला बनाने की मांग पर गंभीरता से विचार करे।
करीब 300 करोड़ रुपये के बुनियादी ढांचे, ग्रीष्मकालीन राजधानी की अधिसूचना और सचिवालय निर्माण की लंबित योजना के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि गैरसैंण को वास्तविक प्रशासनिक केंद्र बनाने की दिशा में ठोस कदम कब उठाए जाएंगे। अब देखना होगा कि 27 अक्टूबर से शुरू होने वाला विधानसभा सत्र क्षेत्रवासियों की उम्मीदों को नई दिशा देता है या राजधानी और विकास से जुड़े सवाल एक बार फिर घोषणाओं तक सीमित रह जाते हैं।

