स्वयं सहायता समूहों और जियो महिला समूहों ने गांवों में जगाई आत्मनिर्भरता की नई उम्मीद
हमारी पंचायत, देहरादून
उत्तराखंड के गांवों में अब महिलाएं केवल घर और खेत तक सीमित नहीं रहीं। पहाड़ की बेटियां आज स्वरोजगार के जरिए अपनी अलग पहचान बना रही हैं। रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और देहरादून के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूह और जियो महिला समूह गांवों की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में जुटे हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत बने महिला समूह अब बेकरी, मशरूम उत्पादन, मिलेट उत्पाद, सिलाई, डेयरी और हस्तशिल्प जैसे कार्यों से जुड़ रहे हैं। इससे महिलाओं की आय बढ़ने के साथ-साथ गांवों में रोजगार के छोटे केंद्र भी विकसित हो रहे हैं।
रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि और ऊखीमठ क्षेत्र में कई महिलाएं बेकरी कार्य से जुड़ी हैं। जियो महिला समूहों के माध्यम से महिलाएं बिस्कुट, केक, कुकीज और मंडुवा-झंगोरा आधारित खाद्य उत्पाद तैयार कर रही हैं। पहले ये उत्पाद केवल स्थानीय उपयोग तक सीमित थे, लेकिन अब बाजार और पर्यटन स्थलों तक भी पहुंचने लगे हैं। इससे कई परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है।
उत्तरकाशी में महिलाओं ने ऊनी उत्पादों और हस्तशिल्प के जरिए नई पहचान बनाई है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं पारंपरिक शॉल, टोपी और अन्य उत्पाद तैयार कर बाजार में बेच रही हैं। वहीं देहरादून के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं जैविक मसाले, अचार और मशरूम उत्पादन से अच्छी आय अर्जित कर रही हैं।
ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार महिला समूहों को प्रशिक्षण, बैंक ऋण और बाजार से जोड़ने पर लगातार काम किया जा रहा है। कई जिलों में स्थानीय उत्पादों की पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी जोर दिया जा रहा है ताकि पहाड़ के उत्पाद बड़े बाजार तक पहुंच सकें।
महिला समूहों की भूमिका केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। कई गांवों में महिलाएं जल संरक्षण, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
हालांकि पहाड़ी क्षेत्रों में परिवहन, बाजार तक पहुंच और डिजिटल जानकारी की कमी अब भी चुनौती बनी हुई है, लेकिन सीमित संसाधनों के बावजूद महिलाओं ने यह साबित किया है कि अवसर मिलने पर वे गांवों की तस्वीर बदल सकती हैं। स्वरोजगार की यह पहल अब पहाड़ में आत्मनिर्भरता और उम्मीद की नई कहानी बनती जा रही है।

