शब्दों से साधना तक: प्रतिमा तिवारी की आत्मिक यात्रा

शब्दों से साधना तक: प्रतिमा तिवारी की आत्मिक यात्रा

अयोध्या से विदेश तक का सफर, साहित्य से अध्यात्म की साधना और जीवन को देखने का अनूठा नजरिया। ‘हमारी पंचायत’ के लिए चंचल डी. रॉय से विशेष बातचीत।

हमारी पंचायत, दिल्ली

जीवन केवल जीने का नाम नहीं, बल्कि स्वयं को खोजने की सतत प्रक्रिया है। साहित्य, अध्यात्म और मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी व आध्यात्मिक मार्गदर्शन से जोड़ने वाली प्रतिमा तिवारी आज देश-विदेश में एक अलग पहचान रखती हैं। ‘हमारी पंचायत’ के लिए चंचल डी. रॉय ने उनसे जीवन, साहित्य, अध्यात्म और आत्मिक यात्रा पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश।

प्रश्न: आपकी शुरुआत अयोध्या-फैजाबाद से हुई, फिर गोरखपुर और इलाहाबाद। इस सफर ने आपको कैसे गढ़ा?

प्रतिमा तिवारी: हम सब आत्मा की एक लंबी यात्रा पर हैं और शरीर उसके पड़ाव मात्र हैं। मेरा जन्म अयोध्या-फैजाबाद में हुआ। पिता पुलिस सेवा में थे, इसलिए बचपन गोरखपुर में बीता। सरस्वती शिशु मंदिर ने मेरे व्यक्तित्व की मजबूत नींव रखी। वहीं योग, प्राणायाम, संस्कृत और भारतीय संस्कृति के संस्कार मिले। बाद में इलाहाबाद आकर डी.पी. गर्ल्स इंटर कॉलेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की। वही शिक्षा आगे चलकर मेरे जीवन का आधार बनी।

प्रश्न: संस्कृत और अंग्रेजी के साथ उर्दू सीखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

प्रतिमा तिवारी: इसका श्रेय मिर्जा गालिब और जगजीत सिंह को जाता है। जगजीत सिंह की गजलें सुनती थी, लेकिन गालिब को समझ नहीं पाती थी। तब महसूस हुआ कि भाषा सीखे बिना उसके सौंदर्य तक पहुँचना संभव नहीं। यही जिज्ञासा मुझे उर्दू तक ले गई। बाद में पंजाबी और फ्रेंच भी सीखने की कोशिश की, लेकिन समय की सीमाओं के कारण उन्हें आगे नहीं बढ़ा सकी।

प्रश्न: विवाह और विदेश प्रवास ने आपकी लेखनी को क्या दिशा दी?

प्रतिमा तिवारी: विवाह के बाद कई वर्ष परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों में बीते। विदेश पहुँची तो वही उर्दू, जिसे शौक से सीखा था, रोजगार का माध्यम बन गई। डायरी में कैद कविताएँ मंच तक पहुँचीं। आकाशवाणी से प्रसारण हुआ, ‘कागज सींचा मैंने’ पुस्तक प्रकाशित हुई और कई प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों से जुड़ने का अवसर मिला। पाठकों का स्नेह इतना मिला कि अपनी रचनाओं का कॉपीराइट तक करवाना पड़ा।

प्रश्न: साहित्य से अध्यात्म की ओर यह बदलाव कैसे आया?

प्रतिमा तिवारी: अध्यात्म मेरे जीवन में अचानक नहीं आया। इसके बीज बचपन में ही पड़ चुके थे। महामारी के दौरान मुझे इसे गहराई से समझने का समय मिला। पिता ज्योतिष जानते थे, इसलिए आधार पहले से था। इसके बाद टैरो, स्पिरिट रीडिंग, पास्ट लाइफ रीडिंग, न्यूमरोलॉजी, वास्तु और अन्य आध्यात्मिक विधाओं का अध्ययन किया। मेरा विश्वास है कि किताबें हमें चुनती हैं, हम किताबों को नहीं।

प्रश्न: आज एक लाइफ कोच के रूप में आपकी भूमिका क्या है?

प्रतिमा तिवारी: लोगों के भीतर धर्म और कर्म को लेकर अनेक भ्रम हैं। मेरा प्रयास उन्हें भय नहीं, बल्कि आत्मबोध की ओर ले जाना है। आज मैं लाइफ कोचिंग, सोल अलाइनमेंट, एनर्जी रेस्टोरेशन, कर्मा एवं एंसेस्ट्रल हीलिंग, क्रिस्टल हीलिंग, चक्र एक्टिवेशन और ट्विन फ्लेम गाइडेंस जैसी विधाओं के माध्यम से लोगों की मदद कर रही हूँ।

प्रश्न: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पाठकों के लिए आपका संदेश?

प्रतिमा तिवारी: जीवन को विद्यालय समझिए। जब तक सीखते रहेंगे, आगे बढ़ते रहेंगे। सीखना बंद होते ही विकास भी रुक जाता है।

दूसरी बात, रिश्तों को बोझ नहीं, जिम्मेदारी समझिए। हर संबंध के प्रति अपने कर्म पूरी ईमानदारी से निभाइए। जब हम अपने रिश्तों और कर्मों का ऋण चुका देते हैं, तभी भीतर से मुक्त होने की प्रक्रिया शुरू होती है। आत्मिक विकास का मार्ग भी यहीं से निकलता है।

“जीवन एक विद्यालय है। सीखना बंद होते ही विकास रुक जाता है, और रिश्तों का ऋण चुकाना ही आत्मिक मुक्ति की पहली सीढ़ी है।” -प्रतिमा तिवारी

1 Comment

  1. After all, what a great site and informative posts, I will upload inbound link – bookmark this web site? Regards, Reader.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *