कण्वाश्रम–भरत से भारतवर्ष C.B.T. श्रेणी में प्रथम, तीन दशक के शोध को सम्मान
हमारी पंचायत, कोटद्वार
कण्वाश्रम की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पौराणिक विरासत को देश के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने वाली शोधपरक कॉफी टेबल बुक ‘कण्वाश्रम–भरत से भारतवर्ष’ को राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार मिला है। फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स एवं मेंबर्स ऑफ इंटरनेशनल पब्लिशर्स एसोसिएशन, जिनेवा की ओर से आयोजित 46वें पुरस्कार समारोह में पुस्तक को आर्ट एवं कॉफी टेबल बुक (C.B.T.) श्रेणी में देशभर में प्रथम स्थान मिला। लगभग पांच हजार पुस्तकों में से शोध, विषयवस्तु, प्रस्तुति और प्रकाशन गुणवत्ता के आधार पर पुस्तक का चयन किया गया।

सोमवार को माल गोदाम रोड स्थित कैंप कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में विधानसभा अध्यक्ष एवं कोटद्वार विधायक ऋतु खण्डूडी भूषण और पुस्तक के लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार मनोज ईष्टवाल ने यह जानकारी दी। ऋतु खण्डूडी भूषण ने बताया कि पुस्तक का लोकार्पण 19 जुलाई को कोटद्वार में हुआ था और महज एक माह के भीतर इसे राष्ट्रीय स्तर पर यह सम्मान मिला है। पुस्तक का प्रकाशन नई दिल्ली के ‘किताब वाले’ प्रकाशन संस्थान ने किया है।
1989 से जारी शोध यात्रा को मिला सम्मान
लेखक मनोज ईष्टवाल ने बताया कि कण्वाश्रम पर उनका शोध और कार्य वर्ष 1989 से जारी है। वर्ष 1992 में उन्होंने कण्वाश्रम पर डॉक्यूमेंट्री बनाने का काम शुरू किया, जो आगे चलकर वर्ष 1995 में ‘शकुंतला’ नृत्य-नाटिका के रूप में दूरदर्शन लखनऊ और दिल्ली से प्रसारित हुई।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1988 में ‘फाउंडर ऑफ गढ़वाल राइफल्स’ पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के दौरान कण्वाश्रम के इतिहास और सांस्कृतिक महत्व पर गंभीरता से काम करने की प्रेरणा मिली। पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. शिवानंद नौटियाल, गढ़वाल भ्रातृ संघ नई दिल्ली के तत्कालीन अध्यक्ष बद्रीश पोखरियाल और समाजसेवी गोकुलानंद बर्थवाल के साथ हुई चर्चाओं के बाद उन्होंने इस विषय पर लगातार शोध शुरू किया।
ईष्टवाल के अनुसार, इस शोध यात्रा में प्राचीन ग्रंथों, लोककथाओं और उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों का अध्ययन करने के साथ ही कण्वाश्रम क्षेत्र और मालिनी नदी के आसपास के दुर्गम इलाकों का पैदल भ्रमण भी शामिल रहा। वर्षों की इसी मेहनत और शोध का परिणाम पुस्तक के रूप में सामने आया है।

भरत से भारतवर्ष तक की कथा
कोटद्वार से करीब 14-16 किलोमीटर दूर मालिनी नदी के तट पर स्थित कण्वाश्रम को महर्षि कण्व की तपोभूमि के रूप में जाना जाता है। भारतीय पौराणिक परंपरा में इसे राजा दुष्यंत और शकुंतला की कथा तथा उनके पुत्र भरत से जोड़ा जाता है। इसी कारण कण्वाश्रम से भरत और भरत से भारतवर्ष तक की सांस्कृतिक यात्रा पुस्तक का प्रमुख केंद्र है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार शकुंतला का पालन-पोषण महर्षि कण्व के आश्रम में हुआ। बाद में राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत ने अपनी वीरता और साम्राज्य विस्तार से भारतीय परंपरा में विशिष्ट स्थान बनाया। उनके नाम से देश को ‘भारत’ अथवा ‘भारतवर्ष’ कहे जाने की परंपरा जुड़ी है। पुस्तक इसी कथा को ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दृश्यात्मक संदर्भों के साथ सामने लाने का प्रयास करती है।
पुस्तक में कण्वाश्रम के प्राकृतिक परिवेश, पौराणिक संदर्भों, ऐतिहासिक सामग्री और सांस्कृतिक विरासत को कलात्मक चित्रों के साथ प्रस्तुत किया गया है। इस लिहाज से यह केवल कॉफी टेबल बुक नहीं, बल्कि कण्वाश्रम की विरासत को दस्तावेजी रूप में सामने रखने का प्रयास भी है।
कण्वाश्रम की विरासत को राष्ट्रीय पहचान
ऋतु खण्डूडी भूषण ने कहा कि कण्वाश्रम केवल कोटद्वार की पहचान नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और परंपरा से जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहर है। कण्वाश्रम से भरत और भरत से भारतवर्ष तक की गौरवशाली यात्रा को पुस्तक ने व्यापक मंच दिया है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद कण्वाश्रम पर आधारित किसी कॉफी टेबल बुक को राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार मिलना कोटद्वार और पूरे उत्तराखंड के लिए गौरव की बात है। कण्वाश्रम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना सामूहिक जिम्मेदारी है।
लेखक मनोज ईष्टवाल ने पुस्तक को राष्ट्रीय सम्मान मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए ऋतु खण्डूडी भूषण का आभार जताया। उन्होंने कहा कि कण्वाश्रम से संबंधित लंबे शोध कार्य को कॉफी टेबल बुक के रूप में देश के सामने लाने में उनका महत्वपूर्ण सहयोग रहा है।
कण्वाश्रम की विरासत पर्यटन, संस्कृति और शिक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मालिनी नदी, आसपास के वन क्षेत्र और पौराणिक परंपराओं से जुड़ा यह क्षेत्र लंबे समय से शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा है। ऐसे में पुस्तक को मिला राष्ट्रीय सम्मान कण्वाश्रम की पहचान और उसके संरक्षण की चर्चा को व्यापक स्तर पर ले जाने का माध्यम बन सकता है।
प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि ‘कण्वाश्रम–भरत से भारतवर्ष’ को मिला प्रथम पुरस्कार केवल एक पुस्तक का सम्मान नहीं, बल्कि कोटद्वार, उत्तराखंड और कण्वाश्रम की सांस्कृतिक विरासत को मिली राष्ट्रीय पहचान है। दशकों के शोध से तैयार यह कृति आने वाली पीढ़ियों को कण्वाश्रम और उससे जुड़ी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से परिचित कराने की दिशा में महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित हो सकती है।
