1873 के कानून की जगह नया विधेयक, उत्तराखंड की जल जरूरतों के हिसाब से बदलेगा ढांचा
हमारी पंचायत, देहरादून
उत्तराखंड में सिंचाई और जल निकासी व्यवस्था से जुड़ा 153 साल पुराना नहर कानून अब बदलने जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में चार अक्टूबर को चंपावत के बनबसा में हुई कैबिनेट बैठक में उत्तरी भारत नहर और जल-निकास अधिनियम, 1873 को समाप्त कर उसकी जगह उत्तराखंड सिंचाई एवं जल निकासी विधेयक-2026 विधानसभा में लाने को मंजूरी दी गई। सरकार का कहना है कि ब्रिटिश दौर में बना यह कानून वर्तमान परिस्थितियों और उत्तराखंड की भौगोलिक जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त नहीं रह गया है।
1873 में बना था नहर कानून
उत्तरी भारत नहर और जल-निकास अधिनियम, 1873 मूल रूप से उत्तरी भारत में सिंचाई और जल निकासी व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था। इसके तहत सरकार को नदियों, धाराओं, झीलों और अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों के पानी के सार्वजनिक उपयोग और नियंत्रण से जुड़े अधिकार दिए गए थे। नहर, जलाशय, जलधाराओं और उनसे जुड़ी संरचनाओं के निर्माण, रखरखाव तथा पानी के उपयोग को भी इसके दायरे में रखा गया।
समय के साथ देश का प्रशासनिक ढांचा बदला, नए राज्य बने और सिंचाई तथा जल प्रबंधन की जरूरतें भी बदलती गईं। इसके बावजूद यह कानून लंबे समय तक प्रभावी रहा। अलग-अलग राज्यों ने अपनी जरूरत के अनुसार बाद में अन्य कानून और नियम भी बनाए, लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद भी नहर और सिंचाई व्यवस्था के कई मामलों में 1873 के कानून की कानूनी भूमिका बनी रही।
नए विधेयक में क्या बदलेगा
उत्तराखंड सिंचाई एवं जल निकासी विधेयक-2026 को प्रदेश की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करने की बात कही गई है। प्रस्तावित व्यवस्था में नहर निर्माण, जल प्रबंधन और जल निकासी को नए सिरे से विनियमित करने का प्रावधान है।
कैबिनेट के फैसले के अनुसार नहर के पानी के अनधिकृत इस्तेमाल पर जुर्माने और नहर की संरचना को नुकसान पहुंचाने पर छह माह तक के कारावास का प्रावधान प्रस्तावित है। नहरों के आसपास 200 मीटर के दायरे में प्लास्टिक और खनन पर रोक का प्रावधान भी प्रस्तावित किया गया है।
हालांकि, अभी यह विधेयक है, कानून नहीं। विधानसभा में पेश होने और पारित होने के बाद ही इसके अंतिम प्रावधान प्रभावी होंगे। इसलिए विधेयक के प्रावधानों में आगे बदलाव की संभावना भी बनी रहेगी।
उत्तराखंड के लिए क्यों अहम
प्रदेश में जल प्रबंधन की चुनौती मैदानी राज्यों से अलग है। पहाड़ों में तेज ढलान, प्राकृतिक जलधाराएं, बरसाती नाले और आपदा का खतरा नहर और जल निकासी व्यवस्था को अलग परिस्थितियों में संचालित करने की मांग करता है।
ऐसे में नए कानून में नहरों के साथ जल निकासी, बाढ़ और भू-क्षरण जैसी स्थितियों को कितना महत्व दिया जाता है, यह महत्वपूर्ण होगा। किसानों के सिंचाई अधिकार, पानी के अनधिकृत उपयोग की परिभाषा और नहरों के आसपास प्रस्तावित प्रतिबंध भी इसके व्यावहारिक असर को तय करेंगे।
153 साल पुराने कानून को बदलने का फैसला इसलिए केवल कानूनी बदलाव नहीं है। इसकी असली परीक्षा इस बात से होगी कि नया कानून उत्तराखंड के पानी, पहाड़ और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप कितना प्रभावी साबित होता है।

