25 साल में 46 हजार हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित, कुल वन हस्तांतरण का 47% अकेले दून में
हमारी पंचायत, देहरादून (एस पी शर्मा)
कभी बासमती की खुशबू, लीची के बागों और शिक्षा की संस्कृति से होती थी। आज मैं अपने घटते जंगलों और बढ़ते कंक्रीट के बीच खड़ा होकर बोल रहा हूँ। पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड में 46 हजार हेक्टेयर से अधिक वन भूमि विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की गई और इस कुल हस्तांतरण का लगभग आधा हिस्सा अकेले मेरे हिस्से आया है। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में मेरी हिस्सेदारी महज छह प्रतिशत है, लेकिन जंगलों के नुकसान में मेरा हिस्सा सबसे बड़ा है।
बदलते दून की कहानी
एक समय शहर में मकान कम, खेत और दरख्त ज्यादा नजर आते थे। स्कूलों और अस्पतालों में फीस कम थी, भरोसा ज्यादा। दूर-दराज से लोग इलाज के लिए आते थे और यह घाटी सैलानियों के सुकून का पसंदीदा ठिकाना मानी जाती थी। शिक्षा, स्वास्थ्य और प्राकृतिक सौंदर्य मेरे सबसे बड़े परिचय थे।
आज वही दून तेजी से फैलती कॉलोनियों, चौड़ी होती सड़कों और सिकुड़ते हरित क्षेत्र के बीच अपनी पुरानी पहचान तलाश रहा है। सड़कें बनीं, खनन हुआ, नए भवन खड़े हुए और विकास की कई परियोजनाएँ आगे बढ़ीं, लेकिन इन सबके बीच मेरे जंगल लगातार पीछे हटते गए। औसतन प्रतिदिन लगभग पाँच हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास कार्यों के लिए परिवर्तित हुआ। यह केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि मेरी साँसों का हिसाब है।
एक नजर में
वन भूमि हस्तांतरण – 46,000+ हेक्टेयर
अवधि – 25 वर्ष
प्रतिदिन औसत नुकसान – 5 हेक्टेयर
राज्य के क्षेत्रफल में दून – 6%
कुल हस्तांतरण में दून – 47%
इतिहास की परतें
मेरी कहानी बहुत पुरानी है। महान अशोक के अखंड भारत की साक्षी रही यह भूमि गुरु द्रोण की नगरी कहलायी। गढ़वाल और सिरमौर रियासतों से लेकर गोरखा और अंग्रेजी शासन तक कई दौर मैंने देखे। सिखों के सातवें गुरु हर राय के पुत्र गुरु राम राय की संगत का डेरा यहाँ पड़ा और बाबा के डेरा तथा द्रोण नगरी के संगम से आज का देहरादून आकार लेता गया।
लेकिन उत्तराखंड राज्य बनने के बाद मेरे जीवन की दिशा तेजी से बदल गई। एक ओर पहाड़ों में नए राज्य के सपनों को आकार देने की कोशिश चल रही थी, दूसरी ओर प्रशासन, राजनीति, कारोबार और निवेश का बड़ा बोझ मेरे कंधों पर लदता गया। राजधानी बनने के बाद जो दबाव बढ़ा, उसने मेरी सूरत और सीरत दोनों को बदल दिया। खेतों की जगह इमारतें आईं, नालों की जगह सड़कें बनीं और जंगलों की जगह कंक्रीट फैलता गया।
जब दून पर्यावरणीय संकट से गुजरा
पर्यावरण विशेषज्ञ याद दिलाते हैं कि यह पहली बार नहीं है जब मैंने ऐसा दबाव झेला हो। 1980 के दशक में चूना पत्थर के व्यापक खनन ने मेरी पारिस्थितिकी को गंभीर क्षति पहुँचाई थी। पहाड़ कटे, जल स्रोत प्रभावित हुए और घाटी का प्राकृतिक संतुलन डगमगा गया।
इसी अनुभव के बाद वर्ष 1989 में मुझे देश के शुरुआती पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल किया गया था। तब लगा था कि अब मेरी हरियाली सुरक्षित रहेगी, लेकिन आज फिर वही चिंता लौट आई है।
फिर से बढ़ता दबाव
तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने मेरे जंगलों पर अभूतपूर्व दबाव बना दिया है। हरित क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं, जैव विविधता प्रभावित हो रही है और वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्ग बाधित हो रहे हैं। भूजल पुनर्भरण की क्षमता घट रही है और तापमान में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही रफ्तार बनी रही तो आने वाले वर्षों में जल संकट, शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव, भूस्खलन, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा और बढ़ सकता है।
देहरादून की पहचान कभी केवल एक प्रशासनिक शहर भर नहीं थी। यह वह घाटी थी जहाँ सुबह की हवा में खेतों की नमी घुली होती थी और शाम ढलते ही दूर पहाड़ों की परछाइयाँ शहर को अपने आगोश में ले लेती थीं। बरसात का पानी जंगलों से रिसकर झरनों और नालों तक पहुँचता था और सर्दियों की धूप पेड़ों की छाँव से छनकर गलियों में उतरती थी। आज वही घाटी लगातार फैलते कंक्रीट के दबाव में अपने प्राकृतिक संतुलन को बचाने की जद्दोजहद कर रही है।
राजधानी बनने के बाद रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में हजारों लोग यहाँ पहुँचे। यह बदलाव स्वाभाविक था, लेकिन नियोजन की कमी ने दबाव को और बढ़ा दिया। जिन क्षेत्रों में कभी खेत थे, वहाँ बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो गईं। जिन पगडंडियों से लोग बागों तक जाते थे, वहाँ अब चौड़ी सड़कें और वाहनों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं। जंगलों का सिकुड़ना केवल पेड़ों की संख्या कम होना नहीं है, बल्कि यह उस जीवनशैली के धीरे-धीरे मिटने की कहानी भी है जिसने दून घाटी को बाकी शहरों से अलग पहचान दी थी।
पुराने दून की याद
“शहर में मकान कम, खेत और दरख्त ज्यादा नजर आते थे…”
आज नये श्रृंगार के नीचे देहरादून की सूरत और सीरत दोनों ज़मीनदोज़ हो गई हैं…”
आने वाले खतरे
जल स्रोतों का कमजोर पड़ना
भूजल पुनर्भरण में कमी
तापमान में वृद्धि
शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव
भूस्खलन और बाढ़ का बढ़ता जोखिम
जैव विविधता पर दबाव
अब सवाल विकास का नहीं, संतुलन का है..
सवाल यह नहीं कि विकास होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि विकास किस कीमत पर हो। क्या जंगलों को खत्म करके ही सड़कें बनेंगी? क्या हर परियोजना के लिए वन भूमि पहला विकल्प होगी? क्या प्रतिपूरक वनीकरण केवल कागजों तक सीमित रहेगा? और क्या पर्यावरणीय समीक्षा वास्तव में स्वतंत्र और पारदर्शी होगी?
पर्यावरणविद मांग कर रहे हैं कि वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाए, संवेदनशील क्षेत्रों में परियोजनाओं की स्वतंत्र समीक्षा हो और प्रतिपूरक वनीकरण की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलित नीति अपनाए बिना दून घाटी की पारिस्थितिकी को बचाना संभव नहीं होगा।
दून की पुकार
मैं देहरादून हूँ। मैंने बासमती की खुशबू, लीची की मिठास, शिक्षा की परंपरा और पहाड़ों का सुकून देखा है। मैंने खनन का दौर भी देखा, राजधानी बनने का दबाव भी और अब जंगलों के सिकुड़ने का दर्द भी महसूस कर रहा हूँ। मेरे जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि मेरी पहचान हैं। यदि वे बचेंगे तो मेरी आत्मा बचेगी; यदि वे खोते गए तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद उस देहरादून को कभी नहीं जान पाएंगी, जो कभी खेतों, दरख्तों, नदियों और सुकून की घाटी के रूप में पहचाना जाता था।

