जौनसारी बोली के प्रथम उपन्यास उईणै का लोकार्पण

जौनसारी बोली के प्रथम उपन्यास उईणै का लोकार्पण

डॉ. विनोद जोशी की कृति प्रेम, जाति और सामाजिक रूढ़ियों के अंतर्द्वंद्व को संवेदनशीलता के साथ करती है उजागर

हमारी पंचायत, देहरादून

उत्तराखंड प्रेस क्लब, देहरादून में जौनसार-बावर क्षेत्र के साहित्यकार डॉ. विनोद जोशी द्वारा रचित जौनसारी- बावरी एवं देवघारी भाषा के प्रथम उपन्यास ‘उईणै (पराकाष्ठा प्रेम की)’ का गरिमामय लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त आईएएस हरिश्चंद्र सेमवाल थे। विशिष्ट अतिथियों में सीबीएसई के पूर्व संयुक्त सचिव रणवीर तोमर, वरिष्ठ साहित्यकार श्रीचंद शर्मा, डॉ. नंदलाल भारती, साहित्यकार सुनीता चौहान तथा सुश्री बिमला उपस्थित रहे।

सभी वक्ताओं ने इसे जौनसारी और देवघारी भाषा-साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह कृति नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का सार्थक प्रयास है।

वक्ताओं ने कहा कि किसी भी भाषा का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब उसमें कविता और लोकगीतों के साथ-साथ उपन्यास जैसी गंभीर साहित्यिक विधाओं का भी सृजन हो। इस दृष्टि से ‘उईणै’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि जौनसारी साहित्य के विकास की नई शुरुआत है।

उपन्यास का कथानक प्रेम, जाति और समाज के अंतर्द्वंद्व पर आधारित है। पाथिक और सफीना की मार्मिक प्रेमकथा के माध्यम से लेखक ने ग्रामीण समाज में व्याप्त जातिगत विभाजन, सामाजिक रूढ़ियों तथा मानवीय संबंधों की विडंबनाओं को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है।

यह रचना प्रेम की विजय का उत्सव नहीं मनाती, बल्कि उन सामाजिक बंधनों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है, जिन्होंने मानवीय भावनाओं को सीमाओं में बांध दिया। इसी कारण यह कृति केवल प्रेमकथा न होकर सामाजिक चेतना और आत्ममंथन का दस्तावेज बनकर सामने आती है।

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