म्यूजियम ऑफ ड्रीम्स को स्टैंडिंग ओवेशन

म्यूजियम ऑफ ड्रीम्स को स्टैंडिंग ओवेशन

मुंबई के संघर्ष की कहानी ने जागरण फिल्म फेस्टिवल में जीता दर्शकों का दिल

हमारी पंचायत, दिल्ली

सपनों की मायानगरी मुंबई की चमक-दमक के पीछे छिपे संघर्ष, इंतजार और टूटते सपनों की कड़वी सच्चाई को पर्दे पर उतारने वाली फिल्म ‘म्यूजियम ऑफ ड्रीम्स’ ने अपने इंडिया प्रीमियर पर दर्शकों का दिल जीत लिया। 14वें जागरण फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित फिल्म को दर्शकों ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सम्मान दिया। हाउसफुल हॉल में सीटें कम पड़ने पर कई दर्शकों ने सीढ़ियों पर बैठकर फिल्म देखी।

मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को पूरी दुनिया सपनों का शहर कहती है, लेकिन इसकी जगमगाती दुनिया के पीछे संघर्ष, अनिश्चितता और अधूरे रह जाने वाले सपनों की एक ऐसी हकीकत भी है, जिस पर अक्सर नजरें नहीं जातीं। स्वतंत्र फिल्मकार राम शर्मा की पहली फीचर फिल्म ‘म्यूजियम ऑफ ड्रीम्स’ इसी अनकही दुनिया और हाशिए पर छूटते कलाकारों के संघर्ष को बेहद संवेदनशीलता के साथ सामने लाती है।

हाल ही में बर्लिन में आयोजित प्रतिष्ठित 14वें इंडो-जर्मन फिल्म वीक के कम्पटीशन सेक्शन में अंतरराष्ट्रीय सराहना हासिल करने के बाद फिल्म का बहुप्रतीक्षित इंडिया प्रीमियर नई दिल्ली में 14वें जागरण फिल्म फेस्टिवल 2026 के तहत आयोजित किया गया।

फेस्टिवल के आखिरी दिन आखिरी शो के रूप में प्रदर्शित की गई इस फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ी। पूरा हॉल खचाखच भरा रहा और सीटें कम पड़ने के कारण कई दर्शकों ने सीढ़ियों पर बैठकर 107 मिनट की यह फिल्म देखी।

फिल्म की भावनात्मक कहानी और कई मार्मिक दृश्यों ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। फिल्म समाप्त होते ही पूरा हॉल खड़ा हो गया और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच फिल्म को स्टैंडिंग ओवेशन मिला।

फिल्म के प्रदर्शन के बाद आयोजित विशेष क्यू एंड ए सत्र में निर्देशक, लेखक, निर्माता और मुख्य कलाकार दर्शकों से रूबरू हुए। इस दौरान दर्शकों ने फिल्म की कहानी के साथ-साथ इसकी सिनेमेटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर की भी जमकर सराहना की। कई दर्शकों ने फिल्म के यथार्थवादी और बेबाक फिल्मांकन की तुलना मधुर भंडारकर, राम गोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप जैसे फिल्मकारों के सिनेमा से भी की।

फिल्म की कहानी हिमाचल प्रदेश के एक सुदूर गांव से मुंबई पहुंचे विष्णु कालटा नाम के युवक के इर्द-गिर्द घूमती है। अभिनेता बनने का सपना लेकर मायानगरी पहुंचा विष्णु पिछले छह वर्षों से अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

यह फिल्म उन पारंपरिक कहानियों से अलग है, जिनमें संघर्ष के बाद आसानी से सुखद अंत मिल जाता है। ‘म्यूजियम ऑफ ड्रीम्स’ कलाकार के उस अंतहीन इंतजार को दिखाती है, जिसमें रोजमर्रा की आर्थिक अनिश्चितता, अनगिनत ऑडिशन, लगातार अस्वीकृतियां और भविष्य की चिंता शामिल है।

समय के साथ विष्णु के लिए अभिनय का संघर्ष केवल करियर बनाने की कोशिश नहीं रह जाता, बल्कि यह उसके अस्तित्व और आत्मसम्मान की लड़ाई बन जाता है। फिल्म इसी मनोस्थिति और सपनों को बचाए रखने की जद्दोजहद को बेहद संजीदगी से पर्दे पर उतारती है।

इंडिया प्रीमियर पर मिले दर्शकों के जबरदस्त प्यार से उत्साहित निर्देशक राम शर्मा ने कहा कि फिल्म के प्रति मिली प्रतिक्रिया पूरी टीम के लिए बेहद उत्साहजनक है। उन्होंने बताया कि ‘म्यूजियम ऑफ ड्रीम्स’ को इस वर्ष दुनिया भर के प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल्स में भेजने की योजना है। इसके बाद टीम की कोशिश फिल्म को जल्द भारत के सिनेमाघरों तक पहुंचाने की होगी, ताकि यह कहानी अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंच सके।

फिल्म के लेखक एवं निर्देशक राम शर्मा हैं। इसकी निर्माता कीर्ति शर्मा हैं, जबकि निलेश जाटवा, राम शर्मा और गौरव शारदा राय सह-निर्माता हैं। मुख्य भूमिकाओं में अमित भारद्वाज, चारु अग्रवाल, धीरेन्द्र कुमार तिवारी और अनुमेहा जैन नजर आए हैं।

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी प्रियशंकर घोष, संपादन अरुण के. किरण और साउंड डिजाइन निलेश जाटवा ने किया है। फिल्म का निर्माण ख़्वाबवाला प्रोडक्शन ने अम्यूजमैक स्टूडियो और सस्ता सिनेमा के सहयोग से किया है।

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