सूखे जलस्रोतों को जीवन देने के मॉडल को अब पूरे उत्तराखंड में लागू करने की तैयारी
हमारी पंचायत, देहरादून
देहरादून: उत्तराखंड में वन पंचायतों को पुनर्जीवित करने और सूखते जल स्रोतों को बचाने के लिए अब सामुदायिक भागीदारी पर आधारित मॉडल को बढ़ावा दिया जाएगा। इसकी प्रेरणा पौड़ी गढ़वाल जिले की उन वन पंचायतों से मिली है, जहां ग्रामीणों ने अपने श्रम और संकल्प से जंगलों और जलधाराओं को फिर जीवंत बना दिया। वन पंचायत विभाग इन सफल प्रयासों को राज्यभर में लागू करने की दिशा में पहल कर रहा है।
पौड़ी की कई वन पंचायतों में बीते एक दशक में स्थानीय समुदाय ने वन संरक्षण को अभियान का रूप दिया। ग्रामीणों ने स्वयं पौधारोपण, चराई नियंत्रण, जलस्रोतों की सफाई और निगरानी जैसे कार्य किए। इसका परिणाम यह हुआ कि जो प्राकृतिक स्रोत सूख चुके थे, वे दोबारा बहने लगे और उजड़ते वन क्षेत्र धीरे-धीरे घने जंगलों में बदल गए। इससे पर्यावरणीय संतुलन के साथ पशुपालन और आजीविका को भी सहारा मिला है।
इन प्रयासों का प्रमुख केंद्र नैनी डांडा क्षेत्र की वन पंचायतें रही हैं, जहां वर्ष 2012 से योजनाबद्ध ढंग से संरक्षण कार्य शुरू हुआ। पंचायत स्तर पर समितियाँ बनीं, अवैध कटान पर रोक लगी और चराई के नियम तय किए गए। लगभग 10 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित घने वन ने वर्षा जल को रोककर भूजल स्तर बढ़ाया, जिससे कई पारंपरिक जल स्रोत फिर सक्रिय हो गए।
वन पंचायतों की सफलता में महिलाओं की भूमिका निर्णायक रही। जल और जंगल से सीधे जुड़ाव के कारण उन्होंने पौधारोपण, पौध संरक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी संभाली। इससे संरक्षण गतिविधियों में सामुदायिक स्वामित्व की भावना मजबूत हुई और कार्य निरंतरता बनाए रखी जा सकी।
वन विभाग का मानना है कि पौड़ी का यह अनुभव पूरे उत्तराखंड के लिए मार्गदर्शक बन सकता है। राज्य में 11 हजार से अधिक वन पंचायतें हैं और यदि इनमें इसी तरह स्थानीय भागीदारी बढ़े तो बड़े पैमाने पर जल संरक्षण और वन संवर्धन संभव है। इसी उद्देश्य से अन्य जिलों के पंचायत प्रतिनिधियों को पौड़ी की सफल पंचायतों का अध्ययन भ्रमण कराने की योजना बनाई जा रही है।
घने होते वनों और पुनर्जीवित जल स्रोतों का सकारात्मक प्रभाव वन्यजीवों पर भी दिखाई दे रहा है। बेहतर आवास और जल उपलब्धता से जैव विविधता में सुधार हुआ है तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष कम होने की संभावना बढ़ी है।
पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में जल और जंगल जीवन का आधार हैं। ऐसे में पौड़ी की वन पंचायतों का यह सामुदायिक मॉडल पर्यावरण संरक्षण के साथ सामाजिक एकजुटता की भी मिसाल बनकर उभरा है। यदि जनभागीदारी की यही भावना अन्य क्षेत्रों में भी विकसित हुई, तो राज्य की वन पंचायतें हरियाली और जल संरक्षण की नई पहचान बन सकती हैं।


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