कला में भीतर के सवालों को आवाज देतीं उष्मिता अग्रवाल

कला में भीतर के सवालों को आवाज देतीं उष्मिता अग्रवाल

कॉन्सेप्चुअल आर्टिस्ट उष्मिता अग्रवाल से वरिष्ठ पत्रकार चंचल डी. रॉय की विशेष बातचीत

हमारी पंचायत, दिल्ली

नोएडा। कला केवल रंगों और आकृतियों का मेल नहीं है। जब कला जीवन के अनुभवों, भावनाओं, सवालों और आत्मचिंतन को व्यक्त करने का माध्यम बन जाए, तो उसका अर्थ और भी गहरा हो जाता है। नोएडा की उभरती कॉन्सेप्चुअल आर्टिस्ट और लेखिका उष्मिता अग्रवाल इसी सोच के साथ अपनी कला यात्रा आगे बढ़ा रही हैं।

उष्मिता मुख्य रूप से कैनवास पर एक्रिलिक रंगों से चित्र बनाती हैं और अपनी कला को ‘इंट्रोस्पेक्टिव कॉन्सेप्चुअल आर्ट’ कहती हैं। उनके लिए हर चित्र के पीछे कोई विचार, अनुभूति, जीवन की सीख, अनुभव, अवलोकन या सवाल होता है। जब कोई विचार उनके भीतर लंबे समय तक बना रहता है और उसे केवल शब्दों में व्यक्त करना पर्याप्त नहीं लगता, तब वह उसे चित्र के माध्यम से व्यक्त करती हैं।

इंटीरियर डिजाइन में डिग्री प्राप्त करने के साथ उन्होंने फैशन डिजाइन, औद्योगिक डिजाइन और ग्राफिक डिजाइन जैसे विभिन्न क्षेत्रों का भी अध्ययन किया है। कला के साथ वह लेखन के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उनकी दो पुस्तकें “Azor: A Journey of Reflection” और “Karmic Trials Unfolding” हैं, दोनों का आईएसबीएन स्वीकृत है।

नवंबर 2025 में नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित इंडिया आर्ट फेस्टिवल में अपनी पहली प्रदर्शनी लगाने के बाद अगस्त 2026 में उन्होंने द हार्ट ऑफ आर्ट के आर्ट ग्रैंडियोर फिल्म एक्सपो में अपना दूसरा संग्रह “Surrender” प्रस्तुत किया।

उष्मिता अग्रवाल की कला यात्रा, लेखन, प्रदर्शनियों, चुनौतियों, भविष्य की योजनाओं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में मानवीय अनुभवों के महत्व को लेकर ‘हमारी पंचायत’, दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार चंचल डी. रॉय ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश—

चंचल डी. रॉय :

आप अपने कला रूप को ‘इंट्रोस्पेक्टिव कॉन्सेप्चुअल आर्ट’ कहती हैं। आपके लिए इसका क्या अर्थ है?

उष्मिता अग्रवाल :

मेरे लिए कला केवल रंगों का संयोजन या कैनवास पर बनाई गई कोई सुंदर तस्वीर नहीं है। मेरा हर चित्र मेरे लिए एक विचार, एक अनुभूति या एक समझ है।

जब जीवन में कोई ऐसा अनुभव, सीख, अवलोकन या सवाल आता है, जो मेरे साथ लंबे समय तक रहता है और जिसे केवल शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए पर्याप्त नहीं होता, तो मुझे उसे एक दृश्य रूप देने की जरूरत महसूस होती है।

इसलिए मेरे लिए मेरा चित्र सिर्फ एक चित्र नहीं है। वह मेरे किसी विचार, अनुभव या अनुभूति की दृश्य अभिव्यक्ति है।

मैं चाहती हूं कि मेरी पेंटिंग देखने वाला व्यक्ति केवल उसे देखकर आगे न बढ़ जाए। वह कुछ पल रुके, सोचे, अपने भीतर झांके और शायद उस चित्र के साथ अपने तरीके से एक संवाद शुरू करे।

चंचल डी. रॉय :

आपके चित्रों की एक खास बात यह है कि आप अलग-अलग चित्रों के बजाय संग्रह के रूप में काम करती हैं। इसके पीछे क्या सोच है?

उष्मिता अग्रवाल :

मैं अपने चित्रों को केवल अलग-अलग चित्रों के रूप में नहीं देखती। मैं संग्रह के रूप में काम करती हूं। मेरे लिए हर चित्र अपने आप में पूरा होता है, लेकिन साथ ही वह अगले चित्र से भी जुड़ा होता है।

एक चित्र के बाद दूसरा चित्र आता है और हर अगला चित्र पिछली सोच को आगे बढ़ाता है। कहीं वह उसे पूरा करता है, कहीं उसे और गहराई देता है और कहीं एक नया सवाल खड़ा करता है।

इसलिए मेरे संग्रह मेरे लिए विचारों की एक यात्रा की तरह हैं, जो धीरे-धीरे सामने आती है।

मेरा पहला संग्रह जहां समाप्त होता है, वहीं से मेरा दूसरा संग्रह शुरू हुआ। और मेरा दूसरा संग्रह जहां समाप्त होगा, वहीं से मेरा तीसरा संग्रह शुरू होगा, जिस पर मैं अब काम करने जा रही हूं।

इस तरह मेरे लिए ये केवल अलग-अलग चित्रों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि मानव चेतना और स्वयं को समझने की लगातार आगे बढ़ती हुई यात्रा हैं।

चंचल डी. रॉय :

आपकी शिक्षा इंटीरियर डिजाइन में हुई है और आपका अध्ययन कई अलग-अलग क्षेत्रों में रहा है। इसका आपकी कला पर क्या प्रभाव पड़ा?

उष्मिता अग्रवाल :

मेरी औपचारिक शिक्षा इंटीरियर डिजाइन में हुई है और मेरे पास इंटीरियर डिजाइन की डिग्री है। इसके साथ-साथ मुझे फैशन डिजाइन, औद्योगिक डिजाइन और ग्राफिक डिजाइन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों को समझने का अवसर भी मिला।

इन सभी क्षेत्रों ने मेरी सोच और चीजों को देखने के तरीके को बहुत प्रभावित किया है। इससे मुझे स्थान, आकार, रचना और विचारों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने की समझ मिली।

मुझे लगता है कि हम जीवन में जो कुछ भी सीखते हैं, उसका प्रभाव किसी न किसी रूप में हमारे काम पर जरूर पड़ता है। मेरी बहुआयामी शिक्षा ने भी मेरी कला की भाषा और मेरे सोचने के तरीके को आकार दिया है।

चंचल डी. रॉय :

आप कला के साथ-साथ लेखन भी करती हैं। अपनी दोनों पुस्तकों के बारे में कुछ बताइए।

उष्मिता अग्रवाल :

मेरी दो पुस्तकें हैं—“Azor: A Journey of Reflection” और “Karmic Trials Unfolding”। दोनों का आईएसबीएन स्वीकृत है।

“Azor: A Journey of Reflection” में ऐसे आत्मचिंतन से जुड़े सवाल हैं, जो मैंने अपनी जीवन-यात्रा और स्वयं को समझने की प्रक्रिया के दौरान खुद से पूछे थे। यह पुस्तक मेरे अपने विचारों, अनुभवों और सवालों से निकली है।

दूसरी पुस्तक “Karmic Trials Unfolding” पौराणिक कथाओं पर आधारित एक विचार है। इसमें मैंने शूर्पणखा की आत्मा की यात्रा को आधार बनाया है और यह समझने की कोशिश की है कि अगर उसका जन्म द्वापर युग में होता, तो वह कौन हो सकती थी और उसकी यात्रा कैसी होती।

मेरे लिए लेखन और चित्रकला दोनों ही अपने विचारों और सवालों को समझने तथा व्यक्त करने के अलग-अलग माध्यम हैं।

चंचल डी. रॉय :

आपने अब तक दो प्रदर्शनियों में अपने काम को प्रस्तुत किया है। एक अनुभव इंडिया आर्ट फेस्टिवल का रहा और दूसरा द हार्ट ऑफ आर्ट का। दोनों अनुभव कैसे रहे?

उष्मिता अग्रवाल :

दोनों अनुभव बहुत अच्छे रहे, लेकिन दोनों एक-दूसरे से काफी अलग थे।

मेरी पहली प्रदर्शनी नवंबर 2025 में इंडिया आर्ट फेस्टिवल, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में हुई थी। वहां मुझे अलग-अलग तरह के लोगों और एक बड़े दर्शक वर्ग से मिलने का अवसर मिला। लोगों ने मेरी कला को किस तरह देखा और उस पर कैसी प्रतिक्रिया दी, इससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।

मेरी दूसरी प्रदर्शनी अगस्त 2026 में द हार्ट ऑफ आर्ट के आर्ट ग्रैंडियोर फिल्म एक्सपो में हुई, जहां मैंने अपना दूसरा संग्रह “Surrender” प्रस्तुत किया। वहां कला की प्रस्तुति और आयोजन की गुणवत्ता मुझे बहुत अच्छी लगी। जिस तरह से मेरे काम को प्रस्तुत किया गया, वह मेरे लिए काफी प्रेरणादायक रहा।

दोनों प्रदर्शनियों ने मुझे अलग-अलग तरह से आगे बढ़ने में मदद की। पहली प्रदर्शनी ने मुझे दर्शकों और उनकी प्रतिक्रियाओं से सीखने का अवसर दिया, जबकि दूसरी ने कला की प्रस्तुति और व्यावसायिक पक्ष को समझने में मदद की।

चंचल डी. रॉय :

आपके परिवार में कोई कलाकार नहीं रहा है। ऐसे में कला की दुनिया में बिल्कुल शुरुआत से अपनी जगह बनाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?

उष्मिता अग्रवाल :

यह मेरे लिए निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण रहा है। मेरे परिवार या खानदान में कोई कलाकार नहीं रहा है। इसलिए मुझे कला की दुनिया में लगभग हर चीज शुरुआत से सीखनी पड़ रही है।

मुझे यह सीखना पड़ा कि कला की दुनिया कैसे काम करती है, अपने काम को किस तरह प्रस्तुत करना है, लोगों तक कैसे पहुंचना है, प्रदर्शनियों के लिए कैसे तैयारी करनी है और अलग-अलग परिस्थितियों को कैसे संभालना है।

कई बार ऐसा भी होता है कि आपको पता ही नहीं होता कि किसी काम की शुरुआत कहां से करनी है। लेकिन शायद यही मेरी यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है, क्योंकि मुझे हर कदम खुद खोजते हुए आगे बढ़ना पड़ रहा है।

इस दौरान मैं बहुत से कलाकारों से जुड़ी हूं। उनसे मुझे सीखने और मार्गदर्शन पाने का अवसर मिला है। उन्होंने मेरी यात्रा में मेरा मार्गदर्शन किया है और मैं उनके सहयोग और विश्वास की बहुत कद्र करती हूं।

चंचल डी. रॉय :

आपके लिए कला केवल एक पेशा है या उससे कहीं ज्यादा?

उष्मिता अग्रवाल :

मेरे लिए कला केवल एक पेशा नहीं है, बल्कि एक उद्देश्य है।

यह मेरे लिए सवालों को समझने, अर्थ खोजने और स्वयं को जानने का एक तरीका है।

मेरी जिंदगी में जो अनुभव मुझे गहराई से प्रभावित करते हैं, जो सवाल मेरे भीतर रह जाते हैं या कोई ऐसी अनुभूति जो बार-बार मेरे सामने आती है, उन्हें एक दृश्य रूप देना मेरे लिए कला है।

मैं नहीं चाहती कि मेरी कला केवल दीवार पर लगी एक सजावटी वस्तु बनकर रह जाए। मैं चाहती हूं कि वह एक संवाद की शुरुआत करे।

कोई व्यक्ति मेरी पेंटिंग देखे और उसके बाद खुद से कोई सवाल पूछे, किसी विचार पर कुछ पल रुके या अपने भीतर ऐसी किसी बात को महसूस करे, जिसके बारे में उसने शायद पहले कभी गंभीरता से नहीं सोचा था।

अगर मेरी कला किसी व्यक्ति को कुछ पल रुककर सोचने के लिए प्रेरित करती है, तो मेरे लिए यही उसकी सबसे बड़ी सफलता है।

चंचल डी. रॉय :

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI का दौर है। ऐसे समय में आप नए कलाकारों को क्या संदेश देना चाहेंगी?

उष्मिता अग्रवाल :

मैं नए कलाकारों से यही कहना चाहूंगी कि अपने भीतर चल रहे ब्रह्मांड को समझना और उसे व्यक्त करना सीखिए।

आज AI का दौर है और तकनीक बहुत तेजी से बदल रही है। लेकिन AI के पास एक चीज नहीं है और वह है—मानवीय अनुभव।

जब कैमरे आए थे, तब भी यह सवाल उठा था कि तस्वीरें खींची जा सकती हैं तो चित्रकला का क्या होगा। लेकिन चित्रकला खत्म नहीं हुई। तस्वीर किसी क्षण को अपने तरीके से सहेजती है और चित्रकला भी किसी क्षण, विचार या भावना को अपने तरीके से व्यक्त कर सकती है।

मैं यह नहीं कहूंगी कि वास्तविक चित्र बनाना मत सीखिए। जरूर सीखिए। अपनी कला की तकनीक और कौशल को मजबूत करना बहुत जरूरी है।

लेकिन उसके साथ-साथ अपने भीतर के ब्रह्मांड को भी खोजिए। अपने अनुभवों, अपनी कल्पनाओं, अपने सवालों और अपने आसपास की चीजों को ध्यान से देखिए और उन्हें भी अपनी कला का हिस्सा बनाइए।

हम इंसान चीजों को जीते हैं। हम महसूस करते हैं, टूटते हैं, सीखते हैं, प्यार करते हैं, दर्द से गुजरते हैं और फिर उन अनुभवों को समझने की कोशिश करते हैं। यही मानवीय अनुभव हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

एक दिन हम सब इस दुनिया में नहीं होंगे, लेकिन हमारी कला यह बता सकती है कि उस समय हम कौन थे, हमने क्या देखा, क्या महसूस किया और अपने आसपास की दुनिया को किस तरह समझा।

मेरे लिए कला की सबसे खूबसूरत बात यही है कि हम अपने भीतर चल रहे ब्रह्मांड को एक रूप दे सकते हैं और वह रूप हमारे बाद भी लोगों के साथ एक संवाद जारी रख सकता है।

चंचल डी. रॉय :

आपकी आगे की योजनाएं क्या हैं? आने वाले समय में दर्शक आपसे क्या उम्मीद कर सकते हैं?

उष्मिता अग्रवाल :

मेरे लिए यह अभी शुरुआत है। मैं अपनी कला की यात्रा को बहुत लंबे समय की यात्रा के रूप में देखती हूं।

अब मैं अपने तीसरे संग्रह पर काम शुरू करने जा रही हूं। इसके बाद चौथा और पांचवां संग्रह भी होगा। उसके बाद भी मेरे पास बहुत सारे विचार हैं, जिन्हें मैं कभी संग्रह के रूप में और कभी अलग-अलग चित्रों के रूप में सामने लाना चाहती हूं।

मेरा सपना है कि मैं अपने सभी संग्रहों को अच्छी तरह पूरा करूं और एक दिन उन्हें इस तरह प्रस्तुत करूं कि लोग केवल चित्रों को देखें नहीं, बल्कि उनके साथ एक विचार-यात्रा पर जाएं।

मैं चाहती हूं कि लोग मेरी कला से कुछ सीखें, कुछ नया महसूस करें और मानव मन तथा उसके चिंतन को थोड़ा और गहराई से समझें।

चंचल डी. रॉय :

अंत में, यदि आपको अपने कला-सफर और आने वाले कलाकारों के लिए कोई संदेश देना हो, तो आप क्या कहना चाहेंगी?

उष्मिता अग्रवाल :

मैं यही कहना चाहूंगी कि अपने भीतर चल रहे ब्रह्मांड को सुनिए और उसे व्यक्त करना सीखिए।

हर इंसान के पास अपने अनुभव हैं, अपने सवाल हैं, अपनी कल्पनाएं हैं और अपनी एक अलग कहानी है। जरूरी नहीं कि हर सवाल का जवाब तुरंत मिल जाए। कभी-कभी किसी सवाल को अपने भीतर जीवित रखना भी जरूरी होता है।

मेरे लिए कला उसी संवाद को जीवित रखने का माध्यम है।

इसलिए मैं चाहती हूं कि मेरी कला जवाब देने से ज्यादा सवाल पैदा करे। क्योंकि शायद स्वयं को समझने की यात्रा में सबसे खूबसूरत बात यही है कि हम सवाल पूछते रहें।

मेरे लिए कला किसी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि स्वयं से, दूसरों से और मानव चेतना से लगातार चलने वाला एक संवाद है।

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