नेपाल हादसे से सबक: वसुंधरा ताल में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम

नेपाल हादसे से सबक: वसुंधरा ताल में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम

13 ग्लेशियल झीलें उच्च जोखिम वाली, 6 का बाथीमेट्रिक सर्वे पूरा; सेंसर और उपग्रह से होगी निगरानी

हमारी पंचायत, देहरादून

उत्तराखंड में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लॉफ) के खतरे से निपटने के लिए ग्लेशियल झीलों की निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र मजबूत किया जा रहा है। इसकी शुरुआत चमोली की वसुंधरा ताल से होगी। मंगलवार को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने सचिवालय से वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के लिए रवाना किया।

29 सितंबर से 15 अक्टूबर तक चलने वाले अभियान में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक व तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं। एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और आईटीबीपी की टीमें भी अभियान में सहयोग करेंगी।

वसुंधरा ताल में जलस्तर सेंसर, स्वचालित मौसम केंद्र, स्नो डेप्थ सेंसर, स्नो सब-सर्फेस टेंपरेचर सेंसर, टिल्ट एवं एक्सेलेरोमीटर, जल प्रवाह सेंसर और सौर ऊर्जा प्रणाली लगाई जाएगी। मोबाइल नेटवर्क नहीं होने की स्थिति में उपग्रह संचार प्रणाली के जरिए आंकड़े बेस स्टेशन तक भेजे जाएंगे। डेटा लॉगर और मॉनिटरिंग डैशबोर्ड से आंकड़ों की निगरानी तथा निर्धारित स्तर से असामान्य बदलाव होने पर अलर्ट जारी करने में मदद मिलेगी।

मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा कि सेंसर, उपग्रह संचार और वास्तविक समय में आंकड़ों की निगरानी से ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिलेगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी अभियान में शामिल वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और सुरक्षा बलों को शुभकामनाएं दीं।

आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी मजबूत करना सरकार की प्राथमिकताओं में है। वसुंधरा ताल से शुरू हो रही व्यवस्था को भविष्य में अन्य संवेदनशील झीलों तक विस्तार देने की तैयारी है।

13 झीलें उच्च जोखिम वाली

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन के अनुसार राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) के 2023 के आंकड़ों में उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित हैं। इनमें से 13 को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया गया है। इनमें बागेश्वर की एक, चमोली की चार, पिथौरागढ़ की छह, टिहरी गढ़वाल की एक और उत्तरकाशी की एक झील शामिल है।

इनमें से छह झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वे पूरा हो चुका है। चमोली की सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल तथा पिथौरागढ़ की दारमा घाटी की मबांग, प्यूनग्रू और स्युंक्ति यांक्ति प्रोग्लेशियल झीलों का सर्वे किया गया है। इससे झीलों की गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य जलवैज्ञानिक आंकड़े जुटाए गए हैं।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार इन आंकड़ों के आधार पर ग्लॉफ के संभावित जोखिम का आकलन और आपदा तैयारियों को मजबूत किया जाएगा। ग्लेशियल झीलों में जलस्तर, आकार और अन्य संभावित बदलावों की नियमित निगरानी पर भी जोर दिया जा रहा है।

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