हमारी पंचायत, देहरादून
प्रियंका जोशी (जिला सूचना अधिकारी, देहरादून)
एक समय था, जब काफल बांज के जंगलों में चुपचाप पका करता था स्वच्छंद और बेफिक्र। हरी पत्तियों के बीच लाल मोतियों-सा छिपा रहता, मानो किसी राह गुजरते बच्चे या किसी उत्सुक चिड़िया की प्रतीक्षा कर रहा हो। वह किसी एक का नहीं था, फिर भी पहाड़ के हर व्यक्ति की स्मृतियों में उसकी खट्टी-मीठी मिठास बसी हुई थी।
लेकिन समय के साथ काफल भी बड़ा हो गया।
उसने भी जैसे दुनिया का तौर-तरीका सीख लिया। अब काफल केवल जंगलों की शाखाओं तक सीमित नहीं है। वह पोस्टरों पर दिखाई देता है, ब्रांडों के नामों में बसता है, संगीत समारोहों की पहचान है और बड़े होटलों के चमकदार मेन्यू तक पहुंच चुका है।
जो काफल कभी खुले आसमान के नीचे बच्चों की उंगलियां रंग दिया करता था, आज वही होर्डिंगों पर सजा दिखाई देता है। उसकी स्वच्छंद पहचान को भी अब बाजार की भाषा में ढाल दिया गया है और उसके स्वाद की कीमत तय हो चुकी है।
फिर भी दुनिया की इस सारी चकाचौंध और शोर-शराबे से दूर, असली काफल आज भी कहीं जंगलों में मौजूद है, उतना ही स्वच्छंद, उतना ही अनगढ़ और उतना ही अपनी असलियत में अडिग।
शायद यह केवल काफल की कहानी नहीं है बल्कि यह हम सबकी कहानी है, जो कभी छोटे कस्बों और गांवों से निकलकर बड़े शहरों की ओर चले थे। बेहतर अवसरों की तलाश में, सपनों का पीछा करते हुए और जीवन को नए अर्थ देने की कोशिश में।
हमने शहरों की भाषा सीख ली। तेज़ चलना सीखा, आत्मविश्वास से बोलना सीखा और पहले से बड़े सपने देखना भी। हममें से कुछ लोग तो अपने गांवों और परिवारों के लिए सफलता की मिसाल बन गए वे लोग, जिनकी कहानियां आज भी घरों में गर्व के साथ सुनाई जाती हैं।
दूर से देखने पर हमारी जिंदगी पहले से कहीं अधिक चमकदार दिखाई देती है। लेकिन भीतर कहीं हम जानते हैं कि हमारा एक हिस्सा अब भी उन पहाड़ों में बसता है, जहां से हम निकले थे। उनकी धीमी रफ्तार में, उनकी सादगी में और उन गर्मियों में, जिनका स्वाद काफल जैसा हुआ करता था।
क्योंकि दुनिया हमें कितना भी तराश ले, कितना भी चमका दे, हमारे भीतर का एक हिस्सा हमेशा उस सहज जीवन को तलाशता रहता है। उस अपनत्व को, जिसकी कोई सीमा नहीं थी। उस मिठास को, जिस पर किसी ब्रांड का नाम नहीं लिखा था। उस घर को, जहां होने के लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं पड़ती।
काफल हमें याद दिलाता है कि बदलना गलत नहीं है। आगे बढ़ना भी जरूरी है। हम कहीं भी जाएं, कुछ भी बनें और दुनिया में अपनी पहचान स्थापित करें, इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन जिस जंगल ने हमें जन्म दिया, वह कभी सचमुच हमसे दूर नहीं जाता।
वह हमारे भीतर कहीं चुपचाप सांस लेता रहता है सूर्यास्त को देखते समय मन में उतरने वाली शांति में, पहली बारिश की मिट्टी की खुशबू में और उन स्मृतियों में, जिनका स्वाद आज भी घर जैसा लगता है।
शायद यही कारण है कि हर बार जब काफल का मौसम लौटता है, तो केवल एक फल नहीं पकता, बल्कि हमारे भीतर सोया हुआ पहाड़ भी फिर से जाग उठता है।


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